संकट संकल्प को जगा देता है - वैश्विक महामारी के संकट की घड़ी में प्रधानमंत्री की यह प्रार्थना कि "21 दिन अपने घरों में ही दूरी बनाकर रहें" रामबाण औषधि की तरह है। जरूरत है सिर्फ संकल्प जगाने की। अगर भारत यह संकल्प जगा सका तो कोरोना के संकट से तो पार पा ही जाएगा; साथ ही नए भा व, नए स और नए रंग से लबरेज होकर नया भारत बन जाएगा। भारतीय संस्कृति में सारी रिद्धि-सिद्धि एकांत में आंतरिक खोज से प्राप्त हुई हैं। स्वाध्याय, प्रार्थना,ध्यान और तप की ओर यदि हम 21 दिनों में स्वयं को मोड़ सकें तो यह कोरोना का अभिशाप वरदान बन सकता है- खुद के साथ हम घर में रहें तो अच्छा है ,बाहर कहर है यह नजर में रहे तो अच्छा है वैज्ञानिकों ने नई खोजें की, कवियों ने काव्य रचे, विचारकों ने नए विचार दिए और महात्माओं ने शांति पाई तो एकांत मेँ। मानव का मन इतना शक्तिशाली और सृजनशील है कि एक बार स्पष्ट आदेश देते ही जंगल भी उसके लिए मंगल बन जाता है। इतनी खतरनाक विकट परिस्थिति में डॉक्टर, मीडिया, पुलिस, सफाईकर्मी और अन्य सेवाकर्मी ने अपनी मन:स्थिति इतनी मजबूत बनाई है कि वे भगवान बन कर उभरे हैं। फिर अन्य इंसानों में क्या कमी है कि वे घरों में साफ-सफाई के साथ एक दूसरे से दूरी बनाकर रहते हुए 21 दिन के समय को गुजार नहीं सकते? मेरा तो सोचना है कि बहुत सरलता से गुजार सकते हैं -बस अपना खयाल रहे। अपना परिवार और अपना राष्ट्र नजरों में समाए रहे। एक ही संकल्प अहर्निश मस्तिष्क में गूंजता रहे-" भूले से भी लक्ष्मण लकीर के पार नहीं जाएंगे , किसी भी हालत में अपना होश नहीं गंवाएंगे". 'शिष्य- गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹