Enough for need - कोरोनावायरसजनित महासंकट की इस घड़ी में लॉकडाउन के उल्लंघन ने एक दूसरी समस्या हमारे सामने खड़ी कर दी। बहुत बड़ी संख्या में मजदूर अपने घरों की ओर चल दिए।। इससे एक तरफ संक्रमण का खतरा बढ़ गया तो दूसरी तरफ गांव में सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन करते हुए इनके प्रवेश के साथ रुकने और खाने-पीने की व्यवस्था की चुनौती खड़ी हो गई। घर जाने वालों की यह सोच - "भूख से मरें या कोरोना से ;मरना ही है तो हम अपने घर पर मरेंगे ताकि चार कंधा देने वाले तो मिलें" - खतरनाक और मूढ़तापूर्ण है। किंतु सवाल उठता है कि शहरों में सरकार की व्यवस्था और अन्य प्रकार के स्वयंसेवी संगठनों की तत्परता पर्याप्त तथा सराहनीय थी तो इतने लोग भूख के कारण क्यों निकल पड़े? राष्ट्रपिता की यह पंक्ति-" There is Enough for need" - को हर दिल व दिमाग में बिठाना समय की मांग है। आवश्यकता की पूर्ति के लिए प्रकृति ने हमें पर्याप्त दे रखा है। पर्याप्त खाद्य-भंडार तथा पर्याप्त अन्य संसाधन विश्वास दिला रहे हैं कि Lock-down की अवधि को हम अच्छी प्रकार से काट लेंगे और इस संकट से बाहर आ जाएंगे।किंतु ऐसा नहीं हो सका क्योंकि मजदूरों को न मालिकों से पर्याप्त सहारा मिला और न सरकार से ।. इस हालात में महात्मा के अपरिग्रह के प्रयोग की याद आती है -" गांधीजी सुबह 10 खजूर नाश्ते में खाते थे। पटेल उनके साथ थे तो उन्होंने रात्रि में 15 खजूर भिंगो दिए। बापू ने सुबह देखा तो सरदार से पूछा कि 10 की जगह 15 खजूर क्यों भिंगोए? पटेल का जवाब था -10या15 में क्या अंतर पड़ता है। तब महात्मा ने कहा कि कल से मैं 5 खजूर ही खाया करूंगा। जब 10 से 15 की संख्या में कोई अंतर नहीं पड़ता तो अपरिग्रह का प्रयोग करने वाले के लिए 10 की जगह 5 खजूर से ही काम चल जाएगा।" भारत के पास किसी भी संसाधन की कमी नहीं है किंतु भारतीयों के पास गांधी वाली सोच की कमी है। तभी तो जमाखोरी और भ्रष्टाचार का मामला ऐसे नाजुक समय में भी सामने आ रहा है। इसीलिए गांधी को कहना पड़ा-" But not for greed ". लोभ-लालच से जन्मा परिग्रह (जमाखोरी) का सिद्धांत Lockdown की चुनौती झेल रहे भारत को Breakdown कर देगा। श्वानों को मिलता दूध-वस्त्र , भूखे बालक अकुलाते हैं की स्थिति जन-विद्रोह को जन्म दे सकती है। शास्त्री जी के कहने पर यही देश जरूरत पड़ने पर उपवास के लिए सहर्ष तैयार हो गया था। रहने और खाने-पीने की सुविधा के लिए अभी विद्यालयों को ही काम में लिया जा रहा है, जिस दिन देवालयों / पूजा स्थलों के दरवाजे भी खोल दिए जाएंगे, उस दिन यह कोई बड़ी समस्या नहीं रह जाएगी। बशर्ते नर को नारायण मानकर पूजा करने वाला यह राष्ट्र अपनी मूल सोच पर लौट आए।-' शिष्य-गुरु संवाद से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹