नागरिक-धर्म -वैश्विक विपत्ति से जीवन जूझ रहा है। अकस्मात् आए इतने बड़े संकट से संघर्ष का कोई प्रशिक्षण नहीं होता और कोई पूर्व तैयारी काम नहीं आती। विपदि धैर्यम् मंत्र कहता है कि विपत्ति में धैर्य रखो। किंतु लाखों लोग सड़कों पर लॉकडाउन तोड़कर संक्रमण फैलाने के लिए और कोरोना को अपने परिवार-गांव तक पहुंचाने के लिए निकल पड़े। सरकारों को दोष दिया जा रहा है किंतु क्या नागरिकों के पास इतनी भी शिक्षा,समझ और विवेक नहीं है कि वे अपने घर में ही रहें?' रणवीर (38 वर्ष) रास्ते में आगरा के पास दम तोड़ दिया'- यह घटना बताती है कि अधैर्य और अविवेक के कारण हम स्वयं को ही नहीं बल्कि पूरे परिवार व समाज को किस मुसीबत में डाल देते हैं- वो लेटा था जमीन पर , लोग कहते हैं कि मर गया ; वो तो बेचारा सफर में था , आज अपने घर गया- क्या इसे परिवार से लगाव कहा जा सकता है? कुल जनसंख्या का 1% भी सरकारी कर्मचारी नहीं है। ऐसे में सरकारें इस महाविपत्ति से स्वयं के बल पर नहीं लड़ सकतीं। हां! मार्ग अवश्य दिखा सकती हैं और सामंजस्य बिठा सकती हैं। ऐसी अंधेरी रात में प्रकाश की किरण शिक्षा-शिक्षक और जनजागरूकता का अभियान हैं। चिंता और चिंतन की बात है कि मजदूर-वर्ग लॉकडाउन के 2 दिनों में ही भूखे कैसे मरने लगे? क्या उन्हें विपत्ति के समय को भांपकर कम से कम 1 सप्ताह की तैयारी पहले से नहीं रखनी थी? दूसरी तरफ सरकारों और उनकी विभिन्न एजेंसियों के बीच सामंजस्य और समन्वय की कमी भी समस्या को जटिल बना रही हैं।। ऐसे अनुभव के आधार पर ही किसी विचारक ने कहा था-" भारत एक धनी देश है, जहां गरीब लोग रहते हैं।" इस गरीब मानसिकता को आज छोड़ना होगा। मन बहुत व्यथित हैं क्योंकि मेरे गांव में एक व्यक्ति बाहर से पहुंच गया और कईयों को मुसीबत में डाल दिया। इस समय भूख से एक-दो मौतें भी बहुत मुश्किल से होगी क्योंकि मीडिया बहुत सजग है। लेकिन संक्रमण से तो हजारों-लाखों मौतें हो जाने की संभावना है। - शिष्य-गुरु संवाद से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹