पहले विवेक मर जाता है , जब नाश मनुज पर छाता है।
April 3, 2020देवदूतों पर हमला :-मानवता को शर्मसार करनेवाली घटनाएं हैं किंतु कोई आश्चर्य की बात नहीं ; क्योंकि इन्हें पता ही नहीं कि इनका कल्याण किस बात में है।बाल-बुद्धि प्रेय/प्रिय से आगे की सोच नहीं रखती। बच्चे तो खिलौनों से ज्यादा कुछ नहीं चाहते हैं किंतु किताबें उन्हें पकड़ानी पड़ती हैं। परिपक्व लोग श्रेय/कल्याण की कामना करते हैं; चाहे पसंद हो या नापसंद। डॉक्टर,नर्स, पुलिस,सफाईकर्मी,मीडिया,सेना ,अन्य सेवाकर्मी व सरकारें सभी अपनी जान की कीमत पर सर्वजन-हिताय यज्ञ में लगे हुए हैं।उनसे असहयोग और उनपर हमले की मानसिकता भावी-अनिष्ट का संकेत है-" पहले विवेक मर जाता है , जब नाश मनुज पर छाता है। " लेकिन मार्गदर्शक ही जब मार्ग भटकाने लगें तो अंधे की क्या गति होगी? अंधेरी गलियों तक सम्यक्-शिक्षा का दीप पहुंचाया जाना चाहिए ताकि लोगों को गुमराह न किया जा सके। सम्यक्-शिक्षा का अर्थ है-जो प्रश्न उठाती हो और जिज्ञासा करती हो। सिर्फ दूसरों से ही नहीं , स्वयं से भी प्रश्न पूछने की क्षमता देने वाली संस्कृति हमारी हैं। प्रश्नोपनिषद वाले देश में न जानें यह कैसी ज्ञान की धारा बहने लगी है -जो प्रश्न पूछने वाले को दुश्मन मान लेती है। एक वक्ता के वक्तव्य को हजारों- लाखों श्रोता सुनते हैं,तालियां बजाते हैं किंतु एक प्रश्न नहीं उठता है। आखिर क्यों? सूचना दे दी जाती हैं और कहा जाता है सोचना नहीं।। फिर वैज्ञानिक सोच विकसित करने की बात मूल कर्तव्यों में क्यों गिनायी गयी है? संविधान की मूल भावना है कि प्रेय से ऊपर श्रेय को तरजीह दिया जाए। 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹