अदृश्य-योगदान- घर में बंद रहने वाले और अपने नागरिक-धर्म का पालन करने वाले लोगों द्वारा जो योगदान इस महासंकट में दिया जा रहा है, उसके आकलन के लिए मेरे पास शब्द नहीं है; किंतु एक अनुभव है। सेना में कार्यरत मेरे पिताजी जब कभी युद्ध के मोर्चे पर अथवा अन्य संकटपूर्ण स्थानों पर जाते थे तो पूरा परिवार प्रार्थना में जुट जाता था।ऐसे समय में घर "को नहीं जानत है जग में कपि , संकटमोचक नाम तिहारो" वाले हनुमानचालीसा के पाठ से गूंजता रहता था। युद्ध में विजय का दृश्य कारण तो होता है सैनिक का पराक्रम लेकिन साथ ही देशवासियों की अदृश्य प्रार्थनाएं भी कम बड़ी भूमिका नहीं निभाती हैं। ऐसा ही हाल आज मेरे परिचित एक डॉक्टर परिवार का है। जब डॉक्टर साहब अपनी जान जोखिम में डालकर कोरोनावायरस से पीड़ित मरीजों का हॉस्पिटल में दिन-रात इलाज कर रहे हैं तो पूरा परिवार घर पर प्रार्थना में लगा हुआ हैं। शायद विज्ञान किसी दिन इन शुभ-तरंगों को पकड़ने में कामयाब हो जाए तो भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास फिर से लिखना पड़ेगा। भारत के सबसे अद्भुत प्रतिभा के धनी और सशस्त्र क्रांति के उद्घोषक श्री अरविंदो घोष ने जब तक क्रांतिकारी संगठन बनाया और अन्य गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई तब तक के उनके योगदान का इतिहास में जिक्र है। किंतु जब वे पांडिचेरी जाकर एकांत-साधना में लीन हो गए तो उनके अदृश्य-योगदान का इतिहास सम्यकरूपेण आकलन नहीं कर पाया। उनसे बहुत प्रार्थना की गई कि वे सार्वजनिक जीवन में लौट आएं और स्वतंत्रता के लिए लोगों को साक्षात् रुप से प्रेरित करें। तब उन्होंने कहा था कि इस अज्ञात जगह से मैं अपनी साधना द्वारा एक ऐसी शक्तिशाली तरंग पैदा करूंगा जो भारत के समग्र प्राणों को आंदोलित कर देगी।भारतीयों का रोम-रोम स्वतंत्रता के भाव से भर जाएगा। एकांत में उन्होंने स्वतंत्रता संघर्ष हेतु क्या किया,इसका ज्यादा जिक्र इतिहास में नहीं है।किंतु भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई है 15 अगस्त को जो श्री अरविंदो घोष का जन्म दिवस भी है । इसे महज इतफाक समझना अदूरदर्शिता का सूचक है। निवेदन यह है कि सभी भारतीयों को इस समय अपनी आध्यात्मिक और अलौकिक शक्तियों को जगाना_ होगा। डॉक्टर,नर्स,सफाई कर्मी, पुलिस,सेना,मीडिया, अन्य स्वयंसेवी संगठन और प्रशासन तो प्रत्यक्ष रूप से दिन-रात मानव- सेवा रूपी यज्ञ में अपनी आहुति दे रहे हैं। उनका गुणगान सर्वत्र हो रहा है और होना भी चाहिए। किंतु हम सामान्य नागरिक भी सोशल-डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए अपने घरों में रहकर अपनी प्रार्थना द्वारा यदि शुभ तरंगों को निर्मित करते हैं तो हमारा अदृश्य योगदान भी अद्भुत और बेमिसाल होगा। तब हम सामान्य नागरिक भी गर्व के साथ प्रत्यक्ष संघर्ष कर रहे देवदूतों से कह सकेंगे- जिंदगी की कड़ी धूप में तू अकेला नहीं है , हमारी दुआओं की बदरिया भी हैं सर पे तेरे . 'शिष्य -गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे हनुमान जयंती की शुभकामनाओं के साथ 🙏🌹