गुड फ्राइडे- ईसा मसीह को जिस दिन सूली दी गई उस दिन को गुड फ्राइडे भी कहा जाता है और ब्लैक फ्राईडे भी। घटना एक ही है किंतु उसे देखने की दृष्टियां अनेक हैं-होली-ग्रेट-गुड फ्राइडे एक तरफ और ब्लैक-फ्राइडे दूसरी तरफ। आखिर ऐसा क्यूँ? कुतूहल जब जिज्ञासा बनी तो खोजबीन शुरू हुई। तब पता चला कि जीवन अपनी-अपनी व्याख्या का नाम है- जिंदगी जख्म भी, नश्तर भी, तलवार भी हैं ; इसमें कहीं शफकत हैं तो कहीं प्यार भी हैं सूली नहीं भी लगती तो मृत्यु तो निश्चित ही थी किंतु सूली ने उस मरणधर्मा शरीर को अमर बना दिया। प्रेम ही परमात्मा है का संदेश देने वाला एक बढ़ई का लड़का जीसस घृणा में जीनेवालों के षड्यंत्र का शिकार हो गया। किंतु सूली को दिल से कुबूल करके और दुश्मनों को भी माफ करके क्राइस्ट बन गया। जिनकी निगाहें सूली देने वाले पर टिकी थीं, उनके लिए यह ब्लैक फ्राइडे था। लेकिन जिन्होंने सिर्फ ईशा को ध्यान में रखा उनके लिए Great/holy/Good Friday हो गया। भारत एक अद्भुत देश है,जहां सत्य तक पहुंचने के लिए विविध धर्म अपने विविध रूपों में न सिर्फ मौजूद है बल्कि मुखर भी हैं। हर धर्म की अपनी खास विशेषता होती हैं और ईसाई धर्म की सबसे बड़ी विशेषता है-" सेवा ". महान ओशो कहते हैं कि स्वामी विवेकानंद ने ईसाई धर्म से प्रभावित होकर ही मुक्ति-प्रधान हिंदू धर्म को सेवा-प्रधान धर्म का स्वरूप दिया। भारतीय मनीषा कहीं से भी अच्छे गुणों या तत्वों को ग्रहण करने की उदार और ग्रहणशील दृष्टि रखती हैं। इस वैश्विक विपदा के समय में सेवा-धर्म हमें इस महासंकट से उबारेगा भी और हमारे भविष्य को संवारेगा भी। मानव सेवा के लिए आज जो अपने तन-मन-धन को अर्पित कर रहे हैं,उनमें ईशा की महान आत्मा की ज्योति अवश्य जल रही होगी अन्यथा इतना बड़ा त्याग संभव नहीं होता- "जहां कहीं है ज्योति जगत में , जहां कहीं उजियाला ; वहां खड़ा है कोई अंतिम मोल चुकाने वाला". 'शिष्य- गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे 🙏🌹