जब विघ्न सामने आते हैं , सोते से हमें जगाते हैं
April 10, 2020संकट और जागरण- राष्ट्रकवि दिनकर जी ने लिखा है- "जब विघ्न सामने आते हैं , सोते से हमें जगाते हैं". किंतु अनुभव बता रहा है कि कोरोना के महाविघ्न में भी लोग गहरी नींद में सोए हुए हैं। अन्यथा चंद-लोग हजारों लोगों को संक्रमित नहीं कर पाते, अपने संक्रमण को छुपा कर लोग प्रशासन को परेशान नहीं करते और जीवन की रक्षा करने वालों पर आक्रमण नहीं करते। संस्कृत के एक श्लोक में वर्णित चारों-युगों (कलियुग, द्वापरयुग,त्रेतायुग,सतयुग) के प्रतिनिधि आज देखे जा सकते हैं- कलि:शयानो भवति अर्थात् सोया हुआ व्यक्ति कलियुग में है। सोए हुए व्यक्ति अपनी आदतों के गुलाम हैं। बाहर निकल कर जब तक अनेक लोगों से माथा-फोड़ी न कर लें, गुटखा,तंबाकू,सिगरेट जब तक अपने मुख में न डाल लें और महफिल जमाकर जब तक मांस- मदिरा का सेवन न कर लें; तब तक उन्हें जीवन व्यर्थ सा लगता है। दूसरे प्रकार के वे लोग हैं, जिनकी नींद तो खुल चुकी हैं किंतु वे अभी उठ कर बैठे नहीं हैं- संजिहानस्तु द्वापर:- ऋषि कहते हैं कि वे द्वापर युग के हैं। तीसरे प्रकार के वे लोग हैं जो बिस्तर छोड़ कर उठ तो चुके हैं,किंतु किस दिशा में जाना है, उस पर अभी विचार कर रहे हैं- उतिष्ठंस्त्रेता भवति- यह त्रेता युग की मानसिकता है। चौथे प्रकार के लोग निर्णय लेकर अपनी मंजिल की तरफ चल देते हैं- कृतम् संपद्यते चरन् - ये सतयुग के प्रतिनिधि हैं।ये जागी हुई आत्माएं हैं, जो दिन-रात इस प्रयास में लगी हुई हैं कि महामारी पर पूर्ण नियंत्रण हो सके। वे अपने परिवार वालों से दूर स्वयं संक्रमण का खतरा उठा कर सोशल डिस्टेंसिंग को मेंटेन करते हुए राष्ट्र-सेवा और मानवता-सेवा हेतु त्याग-तपस्या का जीवन जी रहे हैं। ऐसे जागे हुए लोगों को देखकर सतयुग की याद आ जाती है।। चिंता और चिंतनीय विषय यह है कि सतयुगी-प्रवृत्ति वाले लोगों का त्याग- बलिदान व्यर्थ न जाए इसके लिए अन्य युग के लोगों को कैसे समझाया जाए और रास्ते पर लाया जाए? भारतीय संस्कृति में जीवन का पहला आश्रम ब्रह्मचर्य-आश्रम तपोवन में त्याग के जीवन का प्रशिक्षण देता था और एकांत में बैठकर स्वयं में आनंद लेने की कला सिखाता था। सादा जीवन,उच्च विचार में जीने की आदत के बाद जब व्यक्ति गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर बाजार और भीड़ की दुनिया में आता था तो उसको विद्यार्थी जीवन की याद आती थी। साथ ही वह ब्रह्मचर्य आश्रम और गृहस्थ आश्रम के जीवन के बीच तुलना कर पाने की स्थिति में था। उसके अंतर्मन में एकांत में स्वयं के साथ रहनेवाली आदत की आवाज उठती थी। आजकल तो भीड़- भाड़ में बच्चे जन्म लेते हैं और बाजार में पढ़कर बड़े होते हैं। मां-बाप उन्हें समस्त सुविधाओं से पूर्ण जीवन देने की हर संभव कोशिश करते हैं। ये ही आदतें आइसोलेशन और क्वॉरेंटाइन में आज बाधा बन रही हैं। आज चुनौती यह है कि कुछ सतयुगी जन अपनी सीमा से परे जाकर अपना सर्वस्व न्योछावर कर के भारत को कोरोना-मुक्त बनाना चाहते हैं किंतु जब तक सोए हुए लोग भी जाग न जाएं तब तक उनकी मनोकामना पूरी नहीं हो सकती। काश!यह संकट का क्षण और महान आत्माओं का जागरण सोए हुए लोगों की नींद तोड़ने में सफल हो सके। 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹