बेमिसाल लम्हे- बेटी एक महीने से नर्स की ड्यूटी में लगी हुई थी और अमेरिका में संक्रमण और मौत एक दूसरे से गलबहियां किए हुए चारों तरफ घूम रहे हैं। ऐसे में बेटी को किसी आवश्यक सामान को लाने हेतु घर जाने का अवसर निकल आया और सामने मां दूर खड़ी थी--"दिल की बेताबी किसी कदर छुपा सकती नहीं , सामने मंजिल है और कदम बढ़ा सकती नहीं".....लेकिन प्रेम में अद्भुत शक्ति और समझ होती हैं।। संक्रमण ध्यान में आए तो पास जाना मुश्किल था किंतु प्रेम से भरे हृदय को दूर रख पाना उससे भी ज्यादा मुश्किल था। दिल और दिमाग के बीच का यह संघर्ष क्षणमात्र में एक अविस्मरणीय मनोहारी रूप में सामने आया।। मां ने लॉन्ड्री बैग से चादर निकाली और उसे बेटी के शरीर पर ओढ़ाकर उसे गले से लगा लिया। दोनों के नयना सावन-भादो बनकर तन-मन सब को भिंगो गए। लम्हों की यह मुलाकात सदियों तक भुलाए नहीं भूल सकती। नहीं पता, आजकल दिल अजब-अजब ख्यालों से भरा रहता है। जिन्हें सामने देख रहे हैं,वे कुछ देर के बाद सपना तो नहीं बन जाएंगे। जिंदगी कितनी छोटी है और उसमें मुलाक़ात के क्षण तो पलक-झपकाने जितना है- "आ लग जा गले कि फिर यह हसीं रात हो न हो , फिर इस जनम में तुमसे मुलाकात हो न हो. .. तृप्ति तो होती है प्रेम से; दिमाग वालों ने उसे धन-पद-प्रतिष्ठा में और न जाने किसमें- किसमें और कहां-कहां ढूंढने का पागल प्रयास किया। कितने ऊंचे महल बनाए,कितने नोटों के अंबार लगाए और कितने रुतबे अपने बढ़ाए फिर भी दिल के सूनापन का खटकना बढ़ता ही गया-" दिन के हंगामों में तो वक्त गुजर जाता है , दिल का सूनापन खटकता है जरा रात गए ; जीए जाते है , मगर जीने का सलीका ही नहीं , कहां जाएं?किसको पूछें?, जो राजे-हयात कहे "- जिंदगी का वह राज इस वैश्विक विपदा ने बता दिया। शक्ति का अहंकार चकनाचूर हो गया। एक छोटे से वायरस के सामने विश्व की महाशक्तियां बेबस और विवश हो गईं । राज यह है कि- तंतु प्रेरित गात्र हो तुम , एक पुतले मात्र हो तुम ; इस जगत की नाटिका के , क्षणिक भंगुर पात्र हो तुम- अतः प्रत्येक क्षण को जी लो और प्रेम में भींगकर कर जी लो तभी तृप्त होकर इस जगत से जाओगे।- 'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹