चुनौती के स्वीकार में जीत है
April 13, 2020चुनौती के स्वीकार में जीत है- समस्याओं से ग्रस्त एक राज्य का युवराज एक सिद्ध पुरुष के पास इस निवेदन के साथ पहुंचा कि" इतनी समस्याओं से युक्त इतने बड़े राज्य को, राजा बनने के बाद मैं कैसे संभाल पाऊंगा? सिद्ध पुरुष ने कहा कि उपाय है किंतु मेरे पास 3 महीने ट्रेनिंग में रहना पड़ेगा और मेरी शर्तों पर। युवराज तैयार हो गया क्योंकि भावी चुनौतियों को स्वीकार करने के अलावा अन्य कोई विकल्प न था। उस सिद्ध पुरुष ने सर्वप्रथम युवराज के काले घुंघराले बाल को मुंडवा दिया और बोला कि हमेशा सावधान रहना क्योंकि किसी भी वक्त तुम्हारे सर पर मैं एक छड़ी से प्रहार कर सकता हूं। युवराज ने ऐसी ट्रेनिंग के बारे में कल्पना भी न की थी किंतु अब वचन हार चुका था। ज्यों ही उसका ध्यान चुका कि एक छड़ी गंजी खोपड़ी पर पड़ी। उसका तो दिमाग सन्न हो गया। किंतु एक सप्ताह में उसकी सजगता इतनी बढ़ गई कि सिद्ध के आने के पहले ही वह सतर्क हो जाया करता था। गिनती की छड़ियों के वार ने महीने के अंत तक उसे ध्यानपूर्ण बना दिया। दूसरे महीने में सिद्ध ने कहा कि अब दिन में तुम पर वार करना संभव नहीं ;अतः अब रात्रि में कभी भी प्रहार कर सकता हूं। युवराज ने सोचा कि यह तो हद हो गई। किंतु वचन दे चुकने के बाद उसके पास कोई चारा न था। गहरी नींद में उसे जब खोपड़ी पर छड़ी का प्रहार हुआ तो आंखों से नींद गायब हो गई। दूसरे महीने के अंत तक तो युवराज को रात्रि में भी मारना संभव न रहा। दिन और रात वह जागरूक रहने लगा। सिद्ध के आने के पहले ही वह उसके कदमों की आहट सुन लेता था और रक्षात्मक उपाय अपना लेता था। तीसरे महीने में सिद्ध ने कहा कि अब छड़ी की जगह मेरे हाथ में तलवार होगी। युवराज ने कहा कि छड़ी से तो मैं सिर्फ चोटिल होता था किंतु तलवार से तो मेरी जान भी जा सकती है। सिद्ध ने कहा कि जान की कीमत पर ही कोई ज्ञान मिलता है ।। युवराज तीसरे महीने में इतना सतर्क और जागरूक था कि सिद्ध की छाया भी उसके आसपास आने का प्रयास करती तो वह चिल्ला उठता। तलवार का एक भी वार युवराज पर न हो सका। सिद्ध ने पूछा-" इतने सावधान तुम कैसे हो गए? युवराज -" स्वयं के प्राणों का खतरा था, अतः दिन और रात सतत सावधान रहने लगा।" सिद्ध ने कहा कि अब तुम्हारी ट्रेनिंग पूरी हुई। कैसी भी समस्या हो और कितनी भी समस्या हो सजगता के सामने उसी प्रकार से नहीं टिक सकती जिस प्रकार से दीया जलते ही अंधेरा नहीं टिक पाता। आज कोरोना का मारक व अदृश्य प्रहार किसी से भी और कहीं से भी हो सकता है। इस महासंकट को यदि हम महाअवसर समझें और युवराज की तरह दिन-रात सावधान होकर कोरोना का प्रवेश कहीं से भी न होने दें तो हमारी भी स्थिति ध्यानी- ज्ञानी सी हो जाएगी। तलवार की वार से तो खतरा युवराज को सिर्फ स्वयं के प्राणों पर ही था ,कोरोना की वार से खतरा तो खुद के साथ सभी सगे- संबंधियों को भी हैं। हमें तो उससे भी ज्यादा सावधान होना पड़ेगा क्योंकि यह शत्रु अदृश्य और अज्ञात भी है।। किंतु हमारे पास भी बहुत सारी अदृश्य और अज्ञात शक्तियां हैं, जिन्हें जगाने का यह समय है। कुछ लोगों ने तो अपनी अद्भुत शक्तियों को जगाया है तभी तो वे चौबीसों घंटे अपने प्राणों की बाजी लगाकर महासंकट में महासृजन का कार्य कर रहे हैं। कोई पीपीई किट बना रहा है तो कोई मास्क, कोई भूखों को भोजन करा रहा है तो कोई जिंदगी भर की कमाई दान कर रहा है, कोई टीका खोजने में लगा हुआ है तो कोई जान बचाने में.. . ऐसे सृजनशील लोगों ने इंसानियत की नई परिभाषा गढ़नी शुरू कर दी है। इनसे प्रेरणा लेकर हम सभी सामान्य नागरिकों को भी अपनी सावधानी इतनी बढ़ानी है और इतना ज्यादा सृजनशील होना है कि इस महासंकट के गर्भ से एक अभिनव भारत का जन्म हो सके- हर इम्तिहान से मेरी शख्सियत संवरती है , खुदा! तू मेरे लिए इम्तिहान पैदा कर ; हर अहले फिक्र मेरी बुलंदी पर रश्क करे , तू अपनी सोच में इतनी उड़ान पैदा कर - जरूरत है चुनौतियों को स्वीकार करने की और सोच बदलने की।- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹