Lockdown2समय की मांग =जेट-विमान की गति वाले युग को निश्चल-निस्पंद कर देने वाला ' Stop Exercise ' एक इलेक्ट्रिक शॉक सा प्रतीत हो रहा है। किंतु बीमारी लाइलाज हो तो ऐसे ही उपाय कारगर होते हैं। पश्चिम के देशों के लिए लॉकडाउन और स्टॉप एक्साइज उनकी मूल प्रकृति के विपरीत है,जिसके कारण उनका संक्रमण इतने खतरनाक स्तर तक पहुंचा क्योंकि वे अर्थ को बहुत ज्यादा महत्व देते हैं और वे रुकना ही नहीं जानते। भारतीय संस्कृति के मूल में यह बीज कहीं पड़ा हुआ था ,जो समय आने पर अंकुरित हो गया। अधिकतर लोग अपने घरों में रुके ,तभी संक्रमण एक निश्चित नियंत्रण-सीमा के अंतर्गत है। कुछ लोग जो घरों में नहीं रुक पाए और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं कर पाए, उनकी कुछ मजबूरियां हैं, जिन पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। भारत गांवों का देश हैं और गांवों में आज भी सब कुछ ठहरा हुआ सा लगता है। नए निर्माण और तीव्र गति से परिवर्तन तो कुछ औद्योगिक शहरों की निशानी हैं। अतः लॉकडाउन 2 की सफलता में कोई विशेष अड़चन नहीं दिखता। एक बड़ी आशंका यह व्यक्त की जा रही है कि भूखमरी से बहुत मौतें हो सकती हैं,वह पूर्णतया निराधार है क्योंकि मीडिया की सजगता के कारण उनकी खबरें सामने आ रही हैं और सरकारें उन पर त्वरित गति से काम कर रही हैं। जरूरत है एक मानसिक तैयारी की। पश्चिम के प्रभाव से यह सोच पनपी है कि करने से ही कुछ मिलता है। इस बात में एक हद तक सच्चाई है क्योंकि धन और अन्य सामान काम करने से ही अर्जित किया जा सकता है। किंतु रुकने से या ठहर जाने से भी बहुत कुछ मिलता है ,यह पश्चिम को मालूम नहीं। " अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम ; दास मलूका कह गए सबके दाता राम" - यह मंत्र भारत की इस संकटकालीन परिस्थिति में बहुत काम का है। भारत में अन्न भंडार की कमी नहीं है, कमी है तो उस अनुशासन और संयम की जो हमारी संस्कृति की विशेष पहचान है। जाहि विधि राखे राम , ताहि विधि रहिए की सोच इस प्रतिकूल परिस्थिति में धैर्य प्रदान करेगी। इस महासंकट में सोशल-डिस्टेंसिंग का पालन करने का काम और अपने को अलग-थलग कर कोरोना संक्रमण को बढ़ने से रोकने का काम लाखों लोगों की जान बचाएगा। नालंदा विश्वविद्यालय का उदाहरण आज अनुकरणीय एवं अनुशरणीय है। वहां 10,000 विद्यार्थी एक साथ सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए एकांतवास करते थे। सभी अपने ज्ञान-ध्यान में डूबे रहते थे। भिक्षावृत्ति से जो कुछ प्राप्त हो जाता था,उसी को वे पर्याप्त समझते थे और जब कभी गुरु अचानक" रुक जाओ "(स्टॉप)बोलते थे तो सभी जहां और जिस स्थिति में होते थे,वहीं पर मूर्ति के समान निश्चल-निस्पंद हो जाते थे। संख्या इतनी बड़ी और वहां मौन इतना गहरा कि आज विश्वास नहीं हो सकता। लेकिन आज समय की मांग है कि हम इस पर विश्वास ही नहीं, इसका अभ्यास भी करें। यही राष्ट्रधर्म है और यही नागरिकधर्म भी है;क्योंकि कोरोना को भगाना है और भारत को जिताना है । 'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹