मैं कौन हूं
April 17, 2020अंतर्मुखी बनाम बहिर्मुखी -वैश्विक विपदा भारत को अपनी संपदा के स्मरण दिलाने का कारण भी बन सकती है। लॉकडाउन के कारण सभी को घरों में बंद रहना मजबूरी भी है और जरूरी भी है। भारत में लॉकडाउन अन्य देशों के मुकाबले अधिक सफल रहा है। क्या कारण है इसका? दरअसल मानव की प्रवृत्ति अंतर्मुखी और बहिर्मुखी दो प्रकार की होती हैं। व्यक्ति की तरह देश और काल भी अंतर्मुखी और बहिर्मुखी प्रवृत्ति वाले होते हैं। भारत शुरू से अंतर्मुखी प्रवृत्ति वाला देश रहा है। पद्मासन लगाकर आंख बंद किए हुए ऋषियों की योग-मुद्रा हमारा आदर्श रही हैं और प्रेरणा देती रही हैं। "को अहम" अर्थात् 'मैं कौन हूं' की खोज भारत की प्रमुख खोज रही है। न तन हूं , न मन हूं की खोज अपनी मंजिल को पहुंचती है तब पता चलता है कि-'चिद् रुपो असि सदा साक्षी' अर्थात् मैं चैतन्य स्वरूप साक्षी स्वरूप आत्मा हूं। अतः भारतीय संस्कृति की अनेक विशेषताओं में से एक सबसे प्रमुख विशेषता है- आध्यात्मिक संस्कृति की। वैश्वीकरण के जमाने में संस्कृत भाषा पर जो गहरे शोध चल रहे हैं,उसका मूल कारण है- उसका अध्यात्म-प्रधान भाषा होना। दूसरी तरफ पश्चिमी देश बहिर्मुखी प्रवृत्ति वाले हैं। बाहर निकल कर बहिर्जगत के संबंध में उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण खोजें की। वे चांद-तारों पर गए किंतु उनकी दृष्टि पदार्थ (Matter)पर और पर (Others)पर ही टिकी रही। बाहर निकलने की इसी प्रवृत्ति के कारण अमेरिका में इतनी ज्यादा मौतें होने के बावजूद वहां लॉकडाउन का विरोध हो रहा है। आज पश्चिम के अत्यधिक प्रभाव के कारण पूरब के भी लोगों की प्रवृत्ति बहिर्मुखी हो गई हैं। उसमें कोई गलत बात नहीं है। किंतु जब घरों में बंद रहने से कोरोना महामारी थम सकती हैं तो क्यों न हम अपनी अंतर्मुखी प्रवृत्ति की जड़ों की ओर लौटें? अस्तित्व संकेत दे रहा है कि बाहर निकल कर प्रकृति का बहुत विध्वंस कर चुका है व्यक्ति । अब थोड़े दिन अंदर की तरफ जाओ तो पाओगे कि जिसकी तलाश में सब जगह भटके, वह तो पहले से ही अंदर में मौजूद था। उस आंतरिक संपदा के सामने बाहर की संपदा गौण है। पर आंतरिक संपदा पाने हेतु एक शर्त है- खुद से मिलना हो तो फुर्सत के पलों में मिलना , अक्स दिखते ही नहीं बहते हुए पानी में ; बाद मुद्दत के मिला था वो ,'मगर था कैसा?' , देखना भूल गया उसको मैं हैरानी में- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹