प्रवासी मजदूरों की समस्या बहुत ही नाजुक एवं संवेदनशील हैं। अपना घर-बार छोड़कर न्यूनतम मजदूरी-दर पर काम करने के लिए हजारों किलोमीटर दूर वे जाते हैं। वहां अमानवीय परिस्थितियों में रहकर वे जो कुछ कमाते हैं,उसमें से अपना पेट काटकर अपनों के लिए बचाते भी हैं। ऐसे में अचानक हुए लॉकडाउन ने एक तरफ उनकी आजीविका का सहारा छीन लिया तो दूसरी तरफ कहीं जाने का अन्य कोई विकल्प नहीं छोड़ा। खाने की समुचित व्यवस्था न हो तथा भविष्य अंधकारपूर्ण लग रहा हो तो, घर लौटने की उनकी बेचैनी स्वाभाविक हैं- "ये नजारें अजीब हैं , हम बहुत बदनसीब हैं ; हम कहीं के न रहे , घाट और घर करीब हैं" - मजदूरों की _बदनसीबी यह है कि घाट भी दूर हो गया और घर भी बहुत दूर हो गया।_ मजदूरों के सब सहारे छिन गए हैं -(1)सरकारें उन्हें लॉकडाउन काल के वेतन दिलाने का आश्वासन तो दे रही हैं किंतु उनको काम पर रखने वाले मालिकों की भी हालत खस्ता है। (2)तालाबंदी कितना लंबा चलेगा और फिर से काम शुरू भी हो जाए तो उन्हें काम पर लौटाने की कोई गारंटी नहीं दे रहा हैं। (3) एक तरफ जहां फंसे हुए हैं,वहां की व्यवस्था से वे संतुष्ट नहीं है और दूसरी तरफ वे जिस राज्य के हैं, वहां की सरकारें कोरोना संक्रमण के खतरे के मद्देनजर उनकी वापसी कराने की इच्छुक नहीं हैं।(4) घर और गांव वाले भी जाने-अनजाने इस महामारी को अपने पास तक पहुंचने देना नहीं चाहते- भगवान किसी को गरीबी न दे , गरीबी दे भी तो ऐसे बदनसीबी न दे- ऐसी विशेष परिस्थिति में प्रवासी मजदूरों के लिए एक विशेष कार्य-योजना बनाई जानी चाहिए; अन्यथा- चाट रहे हैं जूठी पत्तल ,कभी सड़क पर खड़े हुए ; और झपट लेने को उनसे , कुत्ते भी हैं अड़े हुए - की स्थिति भी देखने को मिल सकती है।। आपद धर्म निभाने के लिए उन्हें तैयार करने की भी जरूरत है;क्योंकि वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि(१) जिस घर -गांव को वे अपना कह रहे हैं,उनके लिए यहां से कोरोना का उपहार लेकर क्यों जाना चाह रहे हैं? (२)उन अपनों का मानस बदल चुका है- "वहां कौन है तेरा?मुसाफिर जाएगा कहां??"_ 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹