" भय का मनोविज्ञान "-बांसवाड़ा के हर घर में कोरोना-भय दहशत के रूप में प्रवेश कर चुका है। भय जब तक थोड़ा दूर था,लोग उसकी कल्पना करके सिहर उठते थे। अब जब वह भय बहुत पास आ गया तो लोगों के हाथ-पांव फूल गए हैं और लोग कोई भी निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है। चाणक्य कहते हैं-"जब तक भय पास न आ जाए तभी तक उससे डरना चाहिए- तावद् भयस्य भेतव्यं यावद् भयमनागतम् ... जब भय सामने खड़ा हो जाए तो उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए। किंतु भय को समझे बिना यह संभव नहीं। वस्तुतः भय हृदय का स्थायीभाव है;जैसे रति,हास,क्रोध इत्यादि हैं। जिस प्रकार से क्रोध की ऊर्जा उठने पर व्यक्ति अपनी ताकत से दुगुना वजन का पत्थर उठा सकता है ,उसी प्रकार भय की ऊर्जा में व्यक्ति अपनी गति से दुगुनी तीव्रता से दौड़ सकता है। भय की ऊर्जा एक सीमा में हो तो सावधानी कई गुना बढ़ जाएगी किंतु भय यदि सीमा का अतिक्रमण कर जाए तो हृदयाघात तक हो सकता है। ब्रिटेन में कोरोना के भय से कई लोग हृदयाघात के कारण मर रहे हैं। आत्मा में विश्वास और परमात्मा में श्रद्धा हो तो फिर भय सहायक बन जाता है- कथा है कि एक नवदंपत्ति नाव से गंगा पार कर रहे थे। अचानक ऊंची-ऊंची लहरों में नौका डगमगाने लगी और सब कोई भय से कंप गए। सिर्फ दूल्हा निश्चिंत और निष्कंप था। दुल्हन ने पूछा-तुम्हें भय क्यों नहीं लग रहा? झट से दूल्हे ने अपनी तलवार म्यान से निकालकर दुल्हन के गर्दन पर रख दी। दुल्हन हंसने लगी। दूल्हे ने पूछा-भय नहीं होता? दुल्हन बोली- जब तलवार तुम जैसे प्यारे के हाथ में हो तो भय कैसा? दूल्हा बोला- जब पतवार परमात्मा जैसे परम प्यारे के हाथ में हो तो फिर मुझे भय कैसा।- व्यक्ति में सावधानी हो और परमशक्ति में श्रद्धा हो तो कोरोना के भय का सदुपयोग किया जा सकता है।' शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹