"संवेदनशीलता" -हे भगवन्! ऐसा ह्रदय किस मिट्टी से बनाता है? एक युवती अपनी नन्हीं बेटी को लेकर अपने शहर से दूर रिश्तेदार के घर जाने के लिए टैक्सी से निकली। अचानक लॉकडाउन की घोषणा से न तो वह रिश्तेदार के यहां पहुंच पाई और न अपने घर लौटने के लायक रही। और कोई चारा न था तो टैक्सी ड्राइवर ने अपने घर रुकने को कहा। अपने एक कमरे के घर में उसने अतिथि का बिस्तर लगा दिया। स्वयं घर के बाहर अपना खाट बिछा लिया। युवती और उसकी नन्हीं परी के लिए जो कुछ अपनी तरफ से बन पड़ा, उसका इंतजाम उसने उनके खाने हेतु किया। उसके अपने पैसे भी खत्म होने को आ गए। युवती को उसके घर पहुंचाने के लिए उसने कर्फ्यू पास बनवाने हेतु कई सक्षम अधिकारियों से संपर्क किया। लगभग सप्ताह भर की मशक्कत के बाद कर्फ्यू पास बनवाने में वह सफल रहा। इस दरमियान उसने छोटी सी बच्ची और उसकी मां के साथ जितना सहृदयता और शालीनता का व्यवहार किया,उसके कारण एक आत्मीय-संबंध विकसित हो गया। इस दौरान उसने युवती की पति के साथ लगातार संवाद कायम रखा ताकि असमय में बेवजह तनाव उनके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान न पहुंचा दे। इंसानियत की इस मिसाल को जब मैं टीवी पर देख रहा था,तब एक साथ कई भाव मेरे हृदय में उमड़- घुमड़ रहे थे। यदि कोई हादसा युवती के साथ होता तो 24×7 न्यूज़ चैनल्स उसे दिखाते और समाचार-पत्र के प्रथम पृष्ठ पर कई दिनों तक हैवानियत की खबर सुर्खियां बनी रहती। किंतु यह तो इंसानियत की खबर थी। थोड़ी देर के लिए एक विशेष चैनल पर आई और चली गई। सुबह में समाचार-पत्र में उसे ढूंढा तो कहीं भी उसकी खोज-खबर न थी। इतने उदात भावों को उस गरीब ने परिवार से संस्कार में पाया होगा। कितनी लोभ,व्यसन और वासना की आंधियों से तहजीब के दीपक को बुझने से बचाया होगा। किसी की मजबूरी का फायदा उठा कर तो लोग न जाने कितना किराया वसूल लेते हैं किंतु वह तो अपना जरूरी साजो- सामान भी अपनी आय सहित उनकी सेवा में लगा दिया।। उस युवती की भी दाद देनी होगी जिसने मजबूरी में ही सही किंतु इंसान की ईमान पर भरोसा किया। उस ऑटो ड्राइवर की बनियान कई जगह से फटी हुई थी जो उसकी गरीबी की घोषणा कर रही थी किंतु उसका सलीका व व्यवहार अच्छे-अच्छे अमीरों को फीका कर रहा था। वह युवती और उसकी बेटी को घर पहुंचा कर लौटा तो उसके चेहरे पर निश्चिंतता का ऐसा भाव था जैसे किसी की सुरक्षित रखने के लिए दी हुई धरोहर किसी के द्वारा लौटा देने पर होता है। अधिकतर ड्राइवरों पर व्यसन-वासना का ऐसा आरोप मढ़ दिया गया है कि इस हकीकत को लोग फसाना मानने को भी तैयार नहीं होंगे; किंतु- " न पैमाने खनकते हैं ,न दौरे-जाम चलता है ; नई दुनिया के रिंदों में खुदा का नाम चलता है" . इतिहास भी हमने लिखा है तो सियासतदानों का लिखा है। जबकि कई इंसान सुबह खिले फूलों की तरह अपनी सुगंध लुटाकर शाम को मुरझा जाते हैं। जो उस राह से गुजरते हैं,उनके रोम-रोम में उस सुगंध का वास हो जाता है। किंतु शिलापट्ट पर खुदे हुए उद्घाटनकर्ता के नामों की तरह वे सबको दिखाई नहीं देते। अनुभव तो कहता है कि समाज मूल्यविहीन नहीं हुआ है। किंतु मूल्यों को जीने वाले लोगों की और ऐसे उदाहरणों की चर्चा और गुणगान से सबने मुख मोड़ लिया हैं। न तो ऐसे बीजों को खरपतवार से बचाया जाता है और न ही इसमें खाद-पानी डाला जाता है। अपनी जिजीविषा के कारण वे जिंदा बचे हुए हैं और आत्म-संतोष के अतिरिक्त उनका कोई पुरस्कार नहीं है- "जुनूने-रहबरी को वक्त की रफ्तार से पूछो , कोई मंजिल नहीं लेकिन वो सुबहो-शाम चलता है" .-'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹