अलौकिक लोक :-बिना लक्षण वाले मरीज के मिलने से कोरोना के विरूद्ध संघर्ष एक अज्ञात लोक में प्रवेश कर गया। 21वीं सदी को कुछ लोगों ने ज्ञान की सदी कहा था किंतु घटनाएं हमारे सीमित ज्ञान से ज्यादा असीमित अज्ञान की ओर इशारा कर रही हैं। रिसर्च एक पर्दा हटाता है तो कई पर्दे के पीछे छिपी प्रकृति मुस्कुराती खड़ी मिलती है। विज्ञान जितना ज्यादा प्रकृति का रहस्य उघाड़ता जा रहा है, उतना ही ज्यादा परमात्मा की आहट स्पष्ट होती जा रही है-" बिनु पद चलइ , सुनइ बिनु काना ; कर बिनु करम करइ विधि नाना। असि सब भांति अलौकिक करनी , महिमा जासु जाइ नहीं बरनी।।" - लौकिक जगत को समझने के लिए और उसका सदुपयोग करने के लिए विज्ञान वरदान साबित हुआ । किंतु ज्यों ही विज्ञान प्रकृति को जीतने के लिए और उसका दुरुपयोग करने के लिए आगे कदम बढ़ाया त्यों ही अलौकिक संकेत आने लगे। उन संकेतों को समझना बहुत जरूरी है। उपनिषद जब कहता है कि अज्ञान तो अंधकार में ले जाता है और ज्ञान महा-अंधकार में ले जाता है तो यह बात तार्किक बुद्धि को गले नहीं उतरती। किंतु आज का ज्ञान और विज्ञान हमें किस मोड़ पर ले आया?-"मानव मानव की छाया से डरने लगा।" कभी जीने का ऐसा भी सलीका था कि मानव ने पशुओं को ही नहीं,पेड़ों को भी गले से लगाया था- " शकुंतला पौधों को जल पिलाए बिना स्वयं पानी नहीं पीती थी और श्रृंगारप्रिया होने पर भी उनके फूलों को नहीं तोड़ती थी। पति गृह जाने के अवसर पर मृग आंसू बहाते हुए उसका रास्ता रोक कर खड़े थे।"- ऐसी बातें सुनकर नई पीढ़ी मजाक बनाती है। किंतु ऋषियों की दृष्टि में मजाक के पात्र तो वे हैं जो चीरफाड़ या ऑपरेशन के द्वारा ही किसी को जानना चाहते हैं, प्रेम के द्वारा नहीं। एक बच्चे का ज्ञान डॉक्टर को भी होता है और एक मां को भी। लेकिन दोनों के ज्ञान में बहुत अंतर है। डॉक्टर का ज्ञान सिर्फ स्वस्थ तन ही दे सकता है किंतु मां की ममता मन और आत्मन् दोनों को पैदा करने में समर्थ हो जाती हैं जिसे विज्ञान के लिए पकड़ पाना मुश्किल है। क्योंकि लौकिक उपायों से अलौकिक प्रेम नहीं समझा जा सकता है। शायद कोरोना अब उस अलौकिक की ओर बढ़ रहा है।- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹