कहां है अंतरात्मा?- पालघर में साधुओं के साथ जो कुछ हुआ उससे यही पता चलता है कि कुछ लोगों में आत्मा होती ही नहीं,भीड़ में तो कदापि नहीं। जिस देश में अनगिनत लोग अपना सर्वस्व अर्पण करके मानव की सेवा में लगे हुए हैं, उनकी भी तो कहीं परवरिश और शिक्षा- दीक्षा हुई होगी। उन आत्मवानों के परिप्रेक्ष्य में इन आत्महीनों की मानसिकता पर विचार करना होगा, जो भीड़ का हिस्सा बन कर ऐसा नृशंस कृत्य कर रहे हैं। व्यक्ति में प्रेम है तो घृणा भी है, क्रोध है तो करुणा भी है और स्वार्थ है तो परमार्थ भी है। जिसको प्रेम-करुणा-परमार्थ में जीने का आनंद मिल जाए, वह घृणा-क्रोध-स्वार्थ के नर्क में क्यों उतरेगा? या किसी और को क्यों उतरने देगा? लेकिन उत्कृष्ट-उदात्त भावनाओं में वही जी सकता है जिसमें आत्मा का विकास हो जाए । आत्मा के विकास के लिए प्रकृति का भी सानिध्य चाहिए और आत्मवान गुरु की संगति भी चाहिए। प्राचीन काल में गुरुकुल-व्यवस्था यही काम करती थी और आज शिक्षा-व्यवस्था से भी यही उम्मीद की जाती है। अंतरात्मा की आवाज को सुनने वाले और उसका अनुसरण करने वाले लोग जिस समाज में होते हैं, वहां के साधारण जन को एक सम्यक मार्गदर्शन मिल जाता है।। अनजाने में राजा दशरथ के शब्दभेदी बाण से श्रवण कुमार की मृत्यु हुई किंतु उनके अंधे माता-पिता के श्राप के कारण राम को खोना पड़ा और उनके वियोग में अपने प्राण को भी। पालघर में तो अफवाह के कारण भयभीत- क्रोधित-घृणित अंधे लोगों ने निरपराध साधुओं को नृशंस तरीके से मारकर हिंसक पशुओं को भी शर्मसार कर दिया क्योंकि प्राण लेने के बाद पशु भी वार नहीं करते। पुलिस द्वारा साधुओं को भीड़ के हाथों सुपुर्द कर देना तो और भी आश्चर्य में डालता है। बच्चे की चोरी के अफवाह के कारण भीड़ वहशी हो चुकी थी,यह माना। लेकिन सुरक्षाकर्मियों का तो यह उत्तरदायित्व था कि एक तरफ भीड़ के वहशीपन को रोकने का कोई रास्ता निकालते और दूसरी तरफ साधुओं की सुरक्षा का कोई इंतजाम करते। क्या अंतरात्मा की आवाज किसी की भी और कहीं से भी उठनी बंद हो गई हैं? यत्र- तत्र-सर्वत्र सैकड़ों घटनाएं ऐसी घट चुकी हैं जो यह प्रश्न उठा रही हैं कि क्या हमारा लोकतंत्र भीड़तंत्र की ओर बढ़ता जा रहा है? यदि ऐसी घटनाओं पर रोक लगानी है तो भीड़ की मानसिकता पर गहरा चिंतन होना चाहिए और उनकी सोच का गहरा विश्लेषण होना चाहिए। उन पर कोई भी लेवल लगाने से बचना चाहिए अन्यथा उनको एक सुरक्षा कवच मिल जाएगा- "तड़पता आदमी सब्रो क़रार क्या जाने? , जो नफरतों में पला हो वो प्यार क्या जाने??"* 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹