कोरोना से करुण होता बचपन- मम्मी! मैं तुमसे बात नहीं करूंगी। तुम एकदम झूठी हो गई हो। मुझको सिखाती रहती हो कि सदा सच बोलो। फोन पर मम्मी ने पूछा कि-'मैंने क्या झूठ बोला?' बच्ची - तुमने कहा था कि "बांसवाड़ा से तुरंत लौट आऊंगी लेकिन आज 40 दिन बीत गए।" पापा भी अब पहले जैसे नहीं रहे। एक तो जब देखो तब ड्यूटी। और ऑफिस से आने पर पहले जैसे दौड़ कर गले भी नहीं लगाते।। मम्मी - नन्ही सी जान! मैंने झूठ नहीं बोला। कोरोना के कारण सारी गाड़ियां अचानक बंद हो गईं। ऐसे में मैं हजारों किलोमीटर दूर से इलाहाबाद तुम्हारे पास कैसे आऊं? बच्ची - क्या कोरोना इतना ताकतवर है कि सारी गाड़ियों को एक साथ पकड़ कर रोक देता है? अब मुझे कोई प्यार नहीं करता।पापा भी दूर-दूर रहते हैं। मम्मी - बेटा!समझो, कोरोना के कारण पापा मजबूर है। बच्ची -' क्या कोरोना इतना दुष्ट है कि पापा को अपनी बच्ची को गले लगाने से मना कर देता है?' अब मम्मी कैसे समझाए कि कोरोना क्या है और कैसा है? बेटी की तुतलाती प्यारी बातों को सुनकर आंखों से गंगा- यमुना बह चली। हमेशा खिली- खिली सी रहने वाली फूल सी बच्ची अपनी शरारतें और जिद भूलकर मुरझा गई है। मम्मी प्रोफ़ेसर,पापा बड़े अफसर और घर में किसी चीज की कमी नहीं किंतु हालात ने ऐसा विवश कर दिया है कि बच्ची को अकेले घर में रहना पड़ता है।साथ देने को कोई आया तक नसीब नहीं। दुनिया की सारी संपत्तियां और सुविधाएं भी मिलकर नन्हे फरिश्तों और परियों को वो सुख नहीं दे सकते,जो उनको मम्मी-पापा से लिपटकर मिलता था और उनके गोद में खेलकर मिलता था। उनके साथ भी नमस्ते का दौर शुरू हो गया- " ना अपने वश में आना और ना अपने वश में मिलना ; आदमी मजबूर है और किस कदर मजबूर है". वृद्धाश्रम खुलते हैं और उनकी संख्या बढ़ती हैं तो बहुत बड़े-बड़े लेख लिखे जाते हैं। किंतु क्रेच खुलता है तो कहीं सुगबुगाहट तक नहीं होती। सप्तपदी में भी बुजुर्गों के ध्यान रखने की बात आई हैं किंतु कोरोना के कारण करुण होता बचपन किसे दिखाई दे रहा है? किसी ने खूब लिखा है- " सारे मुल्कों को नाज था अपने- अपने परमाणु पर ; कायनात हो गई बेबस एक छोटे से भी विषाणु पर".- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹