महामारी एक चुनौती मात्र- गणतंत्र की पहली लाली जहां फूटी थी,उस वैशाली में महामारी का प्रकोप हुआ। औषधीय और अन्य उपाय बौने साबित होने लगे। लिच्छवी के राजा ने भगवान-बुद्ध को प्रार्थनापूर्ण हृदय से आमंत्रित किया। भगवान के आते ही मृत्यु का तांडव-नृत्य बंद होने लगा, पीले वृक्ष हरे होने लगे और सूखी नदियां जल से आपूरित हो गईं। बुद्ध से लोगों ने पूछा कि इतना महान परिवर्तन का कारण क्या है? बुद्ध ने कहा-" मैं पिछले जन्म में शंख नामक ब्राह्मण था और सभी धर्म के ज्ञानी लोगों की निष्पक्ष भाव से पूजा करता था। उसी पुण्य रूपी बीज का यह प्रभाव है।" कोरोनावायरस जनित महामारी के लिए वैशाली की घटना कुछ संदेश देना चाह रही हैं-(1) इंसान के वश के बाहर यदि बात हो जाए तो तुरंत भगवान को हृदय से प्रार्थनापूर्वक आमंत्रित करना चाहिए। आज के भगवान वे हैं, जिनके पास ध्यान-ज्ञान की संपदा है।(2) शंख नामक ब्राह्मण की तरह निष्पक्ष भाव से सभी धर्मों की दिव्य-आत्माओं को श्रद्धा से याद करना होगा। मोहम्मद,कृष्ण, ईसा,नानक जैसी दिव्य-आत्माएं प्रदीप्त दीपक के समान हैं,जिनके आस-पास नफरत का अंधेरा टिक नहीं सकता। (3) जब महामारी किसी की जाति,धर्म,लिंग, क्षेत्र नहीं पूछ रही हैं तो महाजीवन की कामना वाले लोग ऐसी भूल कैसे कर सकते हैं?(4) महामारी अर्थात सबकी मृत्यु अंतिम सत्य है। इसका उपयोग जागरण बढ़ाने के लिए करना चाहिए ताकि मृत्यु से अमृत का द्वार खुल सके- "मृत्योर्मा अमृतं गमय" . इसके लिए बुद्ध का सूत्र "अप्प दीपो भव" संदेश देता है कि अपने दीपक स्वयं बनो। आज चुनौती इतनी बड़ी हैं कि जब तक प्रत्येक व्यक्ति पूर्ण सावधान और सक्रिय भूमिका में नहीं आएगा तब तक इस महामारी का खात्मा नहीं हो पाएगा। अतः स्वयं को कुछ यूं जगाएं , अंतरतम का नेह बढ़ाएं ; बाहर भी उजाला फैलाएं , एक ऐसा दीपक जलाएं ....'शिष्य- गुरु संवाद'से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹