नृत्य में शामिल होने से चित्त की वृत्तियों का निरोध कैसे होगा?
April 29, 2020जीवन और आजीविका दोनों पर एक साथ उपस्थित संकट की यह परिस्थिति अभूतपूर्व है। बाहर निकलें तो कोरोना से जीवन को खतरा और घर से नहीं निकलें तो आजीविका का संकट गहराता जा रहा है। यह स्थिति व्यक्तिगत जीवन और राष्ट्रीय जीवन में आत्मानुशासन और सामंजस्य की मांग करती है। संसार में ऐसे प्रवेश करना है जैसे आप दुश्मन के शिविर में प्रवेश कर रहे हों, जहां चारों तरफ से जान को खतरा है और अकेले में ऐसे रहना है जैसे आपके भीतर सारा संसार समाया हुआ हो- 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय'की भावना के साथ। ऐसी बातें आजकल पागल दार्शनिक की बकवास लगती हैं किंतु हमारी संस्कृति ऐसी ही बातों पर जोर देती हैं। महर्षि पतंजलि सम्राट पुष्यमित्र के अश्वमेध-यज्ञ की पूर्णाहुति पर नृत्योत्सव कार्यक्रम में यज्ञ का ब्रह्मा होने के नाते सम्मिलित हुए। उनके शिष्य चैत्र के मन में एक योगी के नृत्य में शामिल होने पर प्रश्न उठ गया। जब पतंजलि यह पढ़ा रहे थे कि- चित की वृत्तियों का निरोध ही योग है- तभी चैत्र ने पूछा- "नृत्य में शामिल होने से चित्त की वृत्तियों का निरोध कैसे होगा?" पतंजलि ने बड़ा प्यारा जवाब दिया-" आत्मा का स्वरूप रस है- रसो वै स: । नृत्य-गीत में रस था। अतः मैं शामिल हुआ। किंतु संयम द्वारा उस रस को परिशुद्ध और अविकृत रखा। विकृति की आशंका से रस विमुख होना ऐसा ही है जैसे कोई गृहिणी भिखारियों के भय से घर में भोजन पकाना ही बंद कर दे। इस उदाहरण को यदि हृदयंगम किया जा सके और जीवन में उतारा जा सके तो आज जीवन भी बच जाएगा और आजीविका का काम भी आगे बढ़ जाएगा। किंतु इसके लिए योगियों सी एकाग्रता और संयम चाहिए। यदि कोई मास्क पहनता है, डिस्टेंसिंग का ध्यान रखता है और बार-बार स्वयं को सैनिटाइज करता है तो वह कार्यस्थल पर सुरक्षित रह सकता है। घर पर इम्युनिटी बढ़ाने वाली डाइट के साथ साफ-सफाई और आइसोलेशन के प्रति जागरूक बना रहता है तो वह निवास-स्थल पर भी सुरक्षित बना रहेगा। डॉक्टरों और नर्सों से हमें बहुत कुछ सीखना होगा क्योंकि वे सालों भर रोगियों के बीच में रहते हैं;फिर भी साफ-सफाई और चेहरे पर मुस्कुराहट लिए हुए। इस भीषण संक्रमण के दौर मे उनमें जो संक्रमण फैल रहा है, वह समुचित किट के अभाव के कारण फैल रहा है,न कि उनकी सावधानी की कमी के कारण। यह दुर्लभ जीवन कला पढ़ने में जितना आसान लगती है , जीवन में उतारने में उतनी ही मुश्किल पड़ती है- "बड़ा दुश्वार है दुनिया -ए-हुनर आना भी , तुम्हीं से फासला रखना और तुम्हीं को अपनाना भी".'शिष्य-गुरु संवाद'से डा.सर्वजीत दुबे🙏🌹