सुखस्य अनंतरं दुखं, दुखस्य अनंतरं सुखं ; न नित्यं लभते सुखं, न नित्यं लभते दुखं
May 4, 2020प्र.-सर! अंधेरा ही अंधेरा दिखाई देता है।अभी तक नौकरी पाने के लिए संघर्ष कर रहा था अब तो जिंदगी बचाने के लिए संघर्ष शुरू हो गया, क्या करूं? - प्रिय विद्यार्थी! अभी कोरोना की काई आंखों में जम गयी है। एक तिनका भी आंखों में पड़ जाए तो सूर्य दिखाई नहीं देता। ध्यान से देखो तो तुम्हारे आसपास एक-दो विद्यार्थी ऐसे जरूर मिल जाएंगे जो लॉकडाउन में घर में रहकर सामान्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा अध्ययन कर रहे होंगे। कोरोना को भगाना अपने वश में नहीं है किंतु सेल्फ आइसोलेशन में पढ़ना तो अपने वश में है। कोरोना से बचने के लिए सामान्य सावधानी का पालन करो और बाकी सब कुछ अपनी पढ़ाई में लगा दो।। नौकरी के लिए जो निश्चित किताबें हैं उनको तो पढ़ो ही ; इस समय जिंदगी के लिए भी कुछ पढ़ो। शारीरिक स्वास्थ्य और सौंदर्य के लिए औसतन प्रतिदिन तीन-चार घंटे लोग देते हैं किंतु मानसिक स्वास्थ्य और सौंदर्य के लिए समय ही नहीं बचता। सामान्य विद्यार्थी नौकरी के लिए ही पढ़ते हैं, कोई परीक्षा नजदीक न हो तो एकदम नहीं पढ़ते हैं। परंतु विशेष विद्यार्थी जिंदगी के लिए भी पढ़ते हैं। सत्संगति और स्वाध्याय जीवन को श्रेष्ठता की ओर ले जाते हैं। कोरोना ने बाहर निकलकर संगति बनाने के सारे दरवाजे बंद कर दिए किंतु घर में रहकर श्रेष्ठ पुस्तकों की संगति करने का समय भी हमें दे दिया।. IASटॉपर ईरा का इंटरव्यू मैं सुन रहा था।दिव्यांग शरीर के बावजूद अपना मानसिक सौंदर्य इतना निखारा कि देश की निगाहें उनकी सराहना कर रही हैं। ऑनलाइन एजुकेशन ने तो श्रेष्ठ पुस्तकों और श्रेष्ठ लोगों से घर बैठे जुड़ने का अवसर भी उपलब्ध करा दिया। अभी घना अंधेरा जरूर घिरा है किंतु उसमें उभर रहे प्रकाश की किरणों को भी तो देखो-(1)कोरोना के टीका की खोज में कई वैज्ञानिक दिन-रात लगे हुए हैं(2) डॉक्टर-नर्स संक्रमित होने का खतरा उठाकर भी और डेढ़ लीटर पसीना बहा देने वाली PPEकिट पहनकर भी जीवन रक्षा का यज्ञ कर रहे हैं(3) पुलिसकर्मी रक्षा के साथ जागरूकता फैलाने के अभियान के कारण अपने घर तक नहीं जा पा रहे हैं(4) सफाई कर्मचारी उस गंदगी को साफ कर रहे हैं जिसे दूसरे फैला रहे हैं(5) मीडिया उस जगह पहुंचकर काम कर रहा है जहां कोई जाना नहीं चाहता(6) स्वयंसेवी मानव के लिए ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों के लिए भी अन्नदान के साथ श्रमदान भी कर रहे हैं(7) क्लास में जीवन संवारने वाला शिक्षक आज क्लास के बाहर दिन-रात जीवन बचाने में लगा हुआ है(8) सरकार और प्रशासन जान तथा जहान् को सुरक्षित करने के लिए रातों में भी जाग रहे हैं।। इतने प्रकाश स्तंभ आज हमारे चारों तरफ दिखाई दे रहे हैं;फिर कैसे कह सकते हो कि सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा है? "सुखस्य अनंतरं दुखं, दुखस्य अनंतरं सुखं ; न नित्यं लभते सुखं, न नित्यं लभते दुखं" की ऋषि-घोषणा कहती है कि यह अंधेरी रात उषा के स्वागत के लिए खड़ी है- "आंखवालों को इशारा भी बहुत होता है , अंधेरी-रात में एक सितारा भी बहुत होता है". 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹