पीते हैं दोस्तों हम तो हिसाब के बगैर , बेलुत्फ है यह जिंदगी शराब के बगैर
May 5, 2020क्या जाम है तभी जहान है? - कोरोना-संक्रमण के भारी खतरे के बीच दो पैग जाम के लिए जिस प्रकार से दो गज की दूरी भुला दी गई और जितनी लंबी लाईन लगा दी गई, वह व्यक्ति और सरकार के बेबस और विवश होने का परिचायक है। शराबबंदी और नशामुक्ति को लेकर सरकारें कई प्रकार के अभियान भी चलाती हैं और कठोर नियम भी बनाती हैं।। फिर वह कौन सी मजबूरी है? सरकार को राजस्व चाहिए और व्यक्ति को बेहोशी। जो व्यक्ति समाज में रहता है, वही सरकार में भी है। उस व्यक्ति से पूछें तो जवाब देता है- मुझे पीने का शौक नहीं ,पीता हूँ गम भुलाने को। आखिर कौन सा गम है? मनुष्य होना एक बहुत बड़ा गम है,बेचैनी है क्योंकि एक तरफ वह पशु है तो दूसरी तरफ परमात्मा । यह बेचैनी न पशु को है और न परमात्मा को क्योंकि वे दोनों अपनी-अपनी जगह तृप्त हैं। मनुष्य अपनी आत्मा को विकसित करके परमात्मा बन जाता है तो वह तृप्त हो जाता है।कोरोना- Warriorके रूप में दैवीय काम कर रहे लोगों में आज वह तृप्ति दिखाई पड़ती हैं जबकि उनकी जान खतरे में है। प्रेम-प्रार्थना-सृजन-दान इंसान को भगवान बना देता है। दूसरी तरफ पशु भी तृप्त होते हैं क्योंकि उन्हें आत्मा और परमात्मा का ख्याल ही नहीं आता। मनुष्य जब ऊपर की ओर नहीं उठ पाता है तो शराब या अन्य नशे में गिरकर पशु बन जाता है तो थोड़ी देर को राहत मिल जाती है। यही राहत पाने के लिए यह उपाय है। बिहार और गुजरात में पूर्ण शराबबंदी है। क्या शराब-बिक्री से प्राप्त राजस्व के बिना ये राज्य नहीं चल रहे है? अच्छी तरह से चल रहे हैं और शराबबंदी नैतिक रूप से ऊपर उठने का उपाय है। लेकिन ऊपर उठने के लिए त्याग व तपस्या करनी पड़ती है। गांधी जी जैसे लोगों के प्रभाव में नशे का विरोध कर होश जगाने और बढ़ाने का उपाय किया जाता है। तभी नशा-मुक्ति-अभियान के साथ सत्य-प्रेम-अहिंसा का पाठ भी पढ़ाया जाता है। किंतु जब बेचैन मन को महात्मा का रास्ता कठिन लगता है तो दुरात्मा का रास्ता पकड़ लेता है जिसकी परिणति उड़ता पंजाब के रूप में होती है। कोरोना संक्रमण जब सबसे खतरनाक स्थिति में है और 40 दिनों की त्याग-तपस्या दांव पर लगी हुई हैं, ऐसे नाजुक मोड़ पर किसी की भी लापरवाही अक्षम्य है। राष्ट्रपिता का कहना था कि शराब तन और आत्मा दोनों को नष्ट कर देती हैं। उनकी वंशज शराब की दुकानें खोलकर और शराब के लिए ब्रह्ममुहूर्त से भारी भीड़ लगाकर क्या यह संदेश देना चाहते हैं कि "पीते हैं दोस्तों हम तो हिसाब के बगैर , बेलुत्फ है यह जिंदगी शराब के बगैर" .'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹