वो क्या जानें दर्द क्या होता है , जिनके दिल की जगह पर पत्थर रखा होता है
May 6, 2020सच्चा-धर्म - जीवन का एक बड़ा सत्य है कि संपत्ति और विपत्ति अकेले नहीं आती। कोरोनाविपत्ति के साथ भेदभाव,भुखमरी,पलायन,आर्थिक संकट जैसी कई विपत्तियां साथ-साथ चली आई हैं। अधिकतर व्यक्ति किसी न किसी एक विपत्ति का शिकार हैं,जिससे एक सामूहिक कुंठा या अवसाद ने जन्म ले लिया है। कुंठित स्थिति में हमारी सोच उदार और व्यापक न होकर संकीर्ण और क्षुद्र हो जाती हैं।यह छोटी सोच सबसे बड़ी पीड़ा देती है । अनेक विपत्तियां वास्तविक हैं किंतु भेदभाव की विपत्ति तो एकदम अवास्तविक है। कोरोना से कोई संक्रमित हो जाए तो वह स्वयं और उसका पूरा परिवार दहशत में होता है। ऐसे समय में आस-पड़ोस के लोग अपना बचाव करें और एक दूरी भी बनाएं इतना तो समझ में आता है किंतु रोगी के लिए मन में भेदभाव और घृणा पाल लें यह समझ में नहीं आता । शिक्षित- संभ्रांत कहे जाने वाले लोगों के बीच जब ऐसी घटना घटती है तो मन को बड़ी पीड़ा होती है। जिनके साथ यह घटना घटी उन धरम बाबू ने कोरोना-संक्रमण से ठीक होने के बाद उस सोसाइटी से दूर दूसरी दुनिया बनाने का फैसला कर लिया। पड़ोसियों ने उनकी मदद के लिए आने वाली बाई, सफाईकर्मी,नर्स व ड्राइवर तक को रोकने का प्रयास किया और ऐसी बातें कही जो अत्यंत हृदयहीनता का परिचायक है। ऋषि की उद्घोषणा है कि दूसरे के साथ वह व्यवहार न करो,जो तुम स्वयं अपने साथ नहीं चाहते- आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचारेत्। एहसास और सद्भाव की दुनिया कहां खो गई? किंतु अस्तित्व निराले खेल खेलता है। भेदभाव करने वाले लोगों के परिवार में से एक को कोरोनावायरस का संक्रमण हो गया। उनको ठीक करने के लिए भेदभाव की पीड़ा झेल चुके वे ही धरम बाबू अपना प्लाज्मा देने हॉस्पिटल पहुंचे। पीड़ित परिवारों को ढांढस बंधाया और कहा कि यह बीमारी किसी को भी और कहीं से भी हो सकती हैं। अतः रोगी और उसके परिवार को हमारा मानसिक तथा आत्मिक समर्थन मिलना चाहिए। ऐसे समय में दवा के साथ दुआ की भी जरूरत है। मेरे साथ जो सोसाइटी में व्यवहार हुआ था, वह मुझे ठीक नहीं लगा था, इसलिए मैंने आकर वह सद्भाव बांटने का प्रयास किया है जिसकी संकट के समय मुझे जरूरत थी- "वो क्या जानें दर्द क्या होता है , जिनके दिल की जगह पर पत्थर रखा होता है" - 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹