" दानेन पाणिर्न तु कंगनेन् " यानी हाथ की शोभा दान से होती है, कंगन से नहीं- इस वाक्य का अर्थ सिख समुदाय की लंगर-प्रथा से समझ में आया। जिसमें कुछ हाथ धन दान करते हैं तो कुछ हाथ अन्न। लाखों लोगों का भोजन बन जाता है और लाखों साथ में मिल-बैठकर भोजन कर लेते हैं। किसी भी आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव वहां नहीं है।कैसे यह व्यवस्था की जाती है, इस पर जब कभी सोचता हूं तो आश्चर्य होता है। गुरु नानक देव द्वारा शुरू की गई यह प्रथा 500 वर्षों से भी अधिक समय से अबाधित रुप से आज भी चल रही हैं। खासकर दिल्ली में किसी भी प्रकार का आंदोलन हो और विपरीत परिस्थिति हो तो जरूरतमंदों के लिए भोजन की व्यवस्था करने में सिख समुदाय के लोग सदैव आगे रहे हैं। इनके आयोजकों और प्रबंधकों का नाम भी हमें मालूम नहीं है और न कहीं इनका विज्ञापन आता है। लेकिन इनका काम तो बोलता है क्योंकि आज प्रतिदिन लाखों लोगों को दिल्ली में ये लोग भोजन करा रहे हैं। लंगर प्रथा की शुरुआत के पीछे मूल भावना थी कि तन की तथा आत्मन् की भूख एक जगह गुरुद्वारा में मिटाई जाए। जिस जमाने में विभाजनकारी प्रवृतियां चरम पर हों, उस जमाने में बिना भेदभाव के एक पंगत में बैठकर भोजन करने की बात किसी को सुनाई जाए तो वह अपने कानों पर विश्वास नहीं करेगा किंतु जब मैंने आंखों से देखा तो ऐसा लगा कि दूसरे जगत में पहुंच गया हूं। गुरु नानक के बारे में एक बात सुनता आया हूं कि उनके पिता ने उन्हें लाभ वाले व्यापार के लिए भेजा। अनाज तौलते समय नानक की गिनती एक से 13 तक पहुंची तो वहीं रुक गई। बार-बार वे तेरह को तेरा बोल रहे थे- " तेरा तुझको अर्पण,क्या लागे मेरा" का भाव उनके जेहन पर ऐसा हावी हुआ कि जो भी पास में था वह साधुओं पर लुटा दिया। पिता ने पूछा कि कुछ लाभ हुआ? युवा नानक ने बताया कि बड़ा लाभ हुआ क्योंकि जिसका था ,उस पर लुटा दिया।" ऐसी भावदशा इस लंगरप्रथा की नींव में है। इस प्रकार की शिक्षा विश्व की किसी भी पाठशाला में नहीं पढ़ाई जाती किंतु जीवन की पाठशाला में ऐसे उदाहरण हैं जिन्हें नादान कहकर हम नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन" दुनिया में कुछ ऐसे भी नादान होते हैं, लूटनेवाली दुनिया में खुद कुर्बान होते हैं " . अदृश्य विध्वंसात्मक कोरोनावायरस जब चारों तरफ मौत का तांडव खेल रहा है और भुखमरी का जाल फैला दिया है तो अदृश्य सृजनात्मक परमात्मा लंगर चलाने वाले लोगों के हाथों लाखों लोगों को भोजन करा रहा है। 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹