इस नित्य बदलती दुनिया में मानव!तू कितना धन कमाएगा?कितनी भी दौलत जुटा मगर तू खाली हाथ ही जाएगा
May 13, 2020अर्थ साधन है या साध्य? अर्थप्रधान-युगमें धन साध्य बन गया है। कोरोनावायरस ने एक दुविधा उत्पन्न कर दी- जन बचा लो या धन? अमेरिका ने अर्थव्यवस्था के भारी नुकसान को देखते हुए संपूर्ण लॉकडाउन लगाने में देर कर दी। नतीजा यह हुआ कि जन-हानि बहुत ज्यादा हो गई। भारत ने तुरंत संपूर्ण लॉकडाउन द्वारा संदेश दिया कि हमारे लिए जन प्रमुख है,धन गौण। किंतु लंबे लॉकडाउन ने भारतीय अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी। नौकरियां छिन जाने से गहरी हताशा और निराशा ने आत्महत्या के लिए लोगों को मजबूर किया है। भारतीय दर्शन मानता है कि न तो धन कमाने के लिए मरने की जरूरत है और न तो धन के चले जाने पर आत्महत्या की जरूरत है। धन को साध्य मत बनाओ उसे साधन ही रहने दो। कुछ लोगों की नजरों में धन परमात्मा है । ऐसे लोगों ने व्यक्ति से ज्यादा वस्तु को महत्व दिया। उनके व्यक्तिगत और सामाजिक संबंध इतने कमजोर पड़ गए कि शेयर मार्केट के डूबने पर अच्छे-अच्छे उद्योगपतियों ने सुसाइड कर लिया। क्योंकि- मेरा सपना मनी मनी. . दूसरी तरफ वे लोग हैं जिनके पास धन का इतना अभाव है कि वे अपने व्यक्तिगत और सामाजिक संबंधों का भी निर्वाह नहीं कर सकते। वे स्वयं भुखमरी के कगार पर हैं। आज भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व इस मोड़ पर खड़ा है कि अर्थ केंद्रित व्यवस्था पर उसे पुनर्विचार करना पड़ेगा। इस महामारी के समय में भी कुछ लोग कालाबाजारी द्वारा अपना धन बढ़ा रहे हैं तो मानवता के पतन का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा?-" इस नित्य बदलती दुनिया में मानव!तू कितना धन कमाएगा?कितनी भी दौलत जुटा मगर तू खाली हाथ ही जाएगा". दूसरी तरफ भारत में करोड़ों लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। धन तो मिट्टी है ऐसी भी एक सोच देखी जाती है। ऐसी सोच वाले लोग धन-उत्पादन के हिस्से नहीं बन पाते। दरिद्रनारायण की अवधारणा ने गरीबों को गरीब बने रहने के लिए जगह दिया। आज बुद्ध के मध्यम-मार्ग की जरूरत है- धन न तो परमात्मा है और न मिट्टी है । धन तो एक साधन है,जो मानवीय गरिमा के अनुसार जीवन जीने के लिए जरूरी सुविधाएं मुहैया करा देता है। अतः सम्यक-आजीविका हर एक को मिल सके ऐसी व्यवस्था जरूर की जाए। धन के पीछे पागल लोगों की भी मनश्चिकित्सा की जाए। 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹