असुरक्षा की स्वीकृति हर मन भयभीत है कि अगले क्षण क्या होगा? क्या कोई भी नौकरी फिर से मिल सकेगी? क्या यह अव्यवस्था कल खत्म हो सकेगी? क्या हम कोरोना से आगे भी सुरक्षित रह सकेंगे? क्या हर बाहरी इंसान कोरोना केरियर की तरह ही देखा जाता रहेगा? क्या हमारे जीवन की पहले वाली बेफिक्री कभी लौट सकेगी? कोई हमारा प्रियजन इस वायरस की भेंट तो नहीं चढ़ जाएगा? कहीं वायरस मेरे अंदर भी तो नहीं है?- ऐसा सोचते-सोचते आंखों के आगे अंधेरा छा जाता है और मन निराशा के गहरे भंवर में फंस जाता है। यूं तो जिंदगी में कभी भी, कुछ भी हो सकता है। तथ्य और सत्य यही है कि जिंदगी असुरक्षित है और अनिश्चित भी । इसको यदि परिपूर्ण हृदय से स्वीकार कर लें तभी अभय मिलता है और शांति भी-" अब डोर तेरे ही हाथों में , जी भर के नचा दे काफी है ; अब जीने की है फिक्र किसे , तू मुझे मिटा दे काफी है" . यहां से श्रद्धा का जगत शुरू हो जाता है। जिस परमात्मा ने जन्म दिया है ,उसे बचाना होगा तो बचाएगा , मिटाना होगा तो मिटाएगा। विज्ञान और तर्क की शिक्षा ने बहुत बड़ा भार अपने माथे पर ले लिया कि हम सब कुछ ठीक कर लेंगे। अब कोई रास्ता नहीं सूझ रहा तो धर्म और श्रद्धा की शिक्षा बहुत बड़ा सहारा बनकर आती है- " जो हो रहा है ,अच्छा हो रहा है ; जो होगा , अच्छा होगा". ऐसा ख्याल आते ही चित्त निश्चिंतता से भर जाता है और अभय हो जाता है।-'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹