चिट्ठी एक मजबूर की- अपने दिव्यांग बेटे को घर ले जाने के लिए अन्य कोई साधन न रहने पर एक बाप को जो करना था,उसने किया। लेकिन जिस तरीके से उसने किया,वह सलीका एक तरफ लोक के मन को प्रतिबिंबित करता है तो दूसरी तरफ कल्याणकारी राज्य की हकीकत को बयां करता है। लिखावट उतनी साफ और सुंदर नहीं है किंतु हृदय की बनावट इतनी साफ और सुंदर है कि अत्यंत विकट परिस्थितियों में भी ईमानदारी से जीने की मन:स्थिति को दर्शाता है- "खुदा के खौफ से अनपढ़ गलत नहीं करते , वे ही हैं चोर जो घर में किताबें रखते हैं" धर्मभीरु लोग अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनते हैं। जीवन की पाठशाला ने उन्हें सिखाया है कि-' सज्जन रे,झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है' । अतः मजबूरी में उस मजदूर ने साइकिल तो चुरा ली किंतु अपनी मजबूरी बताकर और माफी मांगने के साथ ' आपका कुसूरवार ' शब्द लिखकर यह संदेश दिया है कि जो कुछ भी उसने किया है,परिपूर्ण होश में किया है। भारतीय दर्शन की गहरी से गहरी मान्यता यह है कि परिपूर्ण होश में किया गया कोई भी कार्य पाप नहीं होता। संसार की अदालत में यह मजबूर भले ही दोषी ठहराया जाए किंतु परमात्मा की अदालत में यह निष्कलंक साबित होगा। असली सवाल तो यह है कि पाप-पुण्य की यह अवधारणा तथाकथित पढ़े-लिखे लोगों को क्यों परेशान नहीं करती? सड़क पर दम तोड़ते इतने मजदूरों और मजबूरों को देख कर भी किसी सरकार का हृदय क्यों नहीं पसीजता?- वे ही हैं चोर जो घर में किताबें रखते हैं... अश्रूपूर्ण श्रद्धांजलि 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹