असली कमाई -लॉकडाउन के पहले एक नाई की दुकान पर सुबह में सेविंग हेतु पहुंचा तो मैंने देखा कि सबसे पहले उसने अपनी दुकान के आगे हरा चारा छितरा दिया, फिर कुछ दूरी पर सामने के मैदान में खाली पड़ी जगह पर कुछ दाने बिखेरे। कुछ देर के बाद हरा चारा खाने के लिए दो गायें आ गईं और बिखेरे दाने को खाने के लिए लगभग 10 कबूतर आ गए। भजन गुनगुनाते हुए और मुस्कुराते हुए जब सेविंग का काम उसने पूरा कर लिया,तब बिना पूछे मुझसे रहा नहीं गया कि चारा और दाना लाते कहां से हो और कब से यह काम कर रहे हो? नाई ने कहा- प्रतिदिन लगभग ₹50 में वह चारे और दाने की व्यवस्था बाजार से कर लेता है और यह संस्कार उसको पिताजी से मिला। तब मेरा दूसरा सवाल था कि दिन भर में कमा कितना लेते हो? उसका जवाब था कि कमाई बड़ी नहीं है किंतु दिल इतना बड़ा है कि जब तक जिऊंगा,तब तक इतना खर्चा तो पशु-पंक्षियों के लिए करता ही रहूंगा। लॉकडाउन में उसकी दुकान बंद रही किंतु चंद रोज पहले सुबह में उसको चारे की जगह पर रोटी डालते देखा और दाने बिखेरते देखा तो मैं रुक गया और उससे बातें करने लगा। उसने बताया कि लॉकडाउन में हरा चारा मिलना बंद हो गया तो रोटी डालनी शुरू कर दी और दाने तो थोक-भाव में पहले ही खरीद लिए थे। दुकान चले या नहीं चले,यह तो समय की बात है। किंतु पशु- पंक्षियों को क्या मालूम कि लॉकडाउन क्या है और दुकान क्या है? वे जब नियत समय पर और नियत स्थान पर मुझसे मिलने आ जाते हैं तो मैं दो रोटी लेकर और मुट्ठी भर दाने लेकर उनके पास क्यूँ नहीं आ सकता? मैंने पूछा कि अभी तो सारी कमाई बंद हो गई होगी फिर ऐसा मन में नहीं आता कि यह अतिरिक्त खर्चा कहां से जुटाऊंगा? उसने सहज भाव से कहा कि सर!यह खर्चा नहीं है, यही मेरे जीवन की असली कमाई है। बाकी कमाई तो यहीं छूट जाएगी लेकिन यह कमाई मेरे साथ जाएगी। पूछे बिना मुझसे न रहा गया कि तेरी पढ़ाई कहां तक हुई है? जवाब था-आर्थिक तंगी के कारण पिताजी ने मुझको स्कूल छुड़वाकर काम पर लगा दिया।उसकी क्वालीफिकेशन (योग्यता) मेरे दिलो-दिमाग में तब से गूंज रही है और आकाश की तरफ आंखें उठाकर पूछता हूं- "ऐसे गहरे भाव कहां से आते हैं? ऊपरवाले ऐसा दिल किस मिट्टी से बनाते हैं??" -'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹