"धर्मो रक्षति रक्षित:"- यह मंत्र कहता है कि अपने धर्म की रक्षा करने पर आप सुरक्षित हो जाते हैं। धर्म शब्द का अर्थ है जो धारण करे और समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करे। मास्क पहनना,सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन करना,लक्षण दिखने पर सूचना देना तथा अपने पारिवारिक- सामाजिक- राष्ट्रीय कर्तव्यों का निर्वहन करना आज प्रत्येक नागरिक का धर्म है। किंतु दुख इस बात का है कि जो हर नागरिक का कर्त्तव्य(धर्म) है,उसके लिए भी पुलिस-प्रशासन को निगरानी रखनी पड़ रही है। दूसरी तरफ सरकारों को भी उनके धर्म की याद दिलानी पड़ रही है कि मजदूरों की समुचित व्यवस्था करें। मां-बाप, शिक्षक जब अपने निर्धारित कर्तव्य का पालन करते हैं तो बच्चे के हृदय में सम्मान धारण कर लेते हैं,तभी तो मातृ-पितृ-गुरु देवो भव के अधिकारी बन जाते हैं। उसी प्रकार से जो बच्चे भी अपने स्वाध्याय-अनुशासन इत्यादि धर्मों का भलीभांति निर्वहन करते हैं, उनको स्वत: ही कई अधिकार मिलते चले जाते हैं। भारतीय ऋषियों की यह दृष्टि थी कि कर्तव्य(धर्म) रूपी जड़ में पानी डाला जाएगा तो उस पर अधिकार रूपी फूल स्वत: ही आ जाएंगे। अतः सरकार जो मां-बाप के समान होती हैं और नागरिक जो बच्चे के समान होते हैं, सभी अपने- अपने धर्म का पालन करें तभी इतने प्रकार के संकटों के जाल से बाहर निकला जा सकता है। कथा है कि साधु बिच्छू को पानी से बार-बार बाहर निकाल रहा था और बिच्छू डंक मार रहा था। नजदीक से यह सारा खेल देख रहे एक व्यक्ति ने साधु से पूछा कि जब बिच्छू बार-बार डंक मार रहा है तो उसे आप बार-बार पानी में डूबने से क्यों बचा रहे हैं? साधु का जवाब था- बिच्छू अपने धर्म(स्वभाव) का निर्वाह कर रहा है और साधु होने के नाते मैं अपने धर्म का। मानव की संभावना दोनों हैं- चाहे तो वह अपने धर्म की रक्षा कर साधु बन जाए अथवा धर्म से च्युत होकर बिच्छू । जब यह संकटों का दौर खत्म होगा तो इतिहास जरूर पूछेगा कि किसने-किसने अपने धर्म का निर्वाह किया? हवाओं से कह दो खुद को आजमा के दिखाए ; बहुत दीपक बुझाती हैं , एक जरा जला के दिखाए - 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹