ईद मुबारक हो फिजाओं में गुंजायमान है। रमजान के पवित्र महीने में की गई साधना का फल ईद मिलन के रूप में प्राप्त होता है। किंतु इस बार मिलन का रूप-रंग पूरा बदला हुआ रहेगा। सामूहिक नमाज और गले मिलने की जगह पर व्यक्तिगत इबादत और एक दूरी से अभिवादन को व्यवहार में ला पाना एक बहुत बड़ी चुनौती है। किंतु हर धर्म अपनी उपासना पद्धति द्वारा व्यक्ति को इतना जागरूक बना देता है कि वह अपने को बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार ढालने में सक्षम हो जाता है। होली जैसे त्यौहार पर भी कई लोगों ने इस परिपक्वता का परिचय दिया था। भारत की यह बहुत बड़ी शक्ति है कि यहां विविध धर्म जीवन को खुश होने के कई मौके देते हैं। ईद उल फितर भी एक ऐसा मौका है जो लॉकडाउन की उदासियों में भाव परिवर्तन का अवसर देगा और हमें नए जोश-खरोश से भर देगा। बहुत प्रकार के संकटों से घिरे हुए इस समय में खुशियों को चुरा लेने का एक भी मौका बहुत बहुमूल्य है। हजार कांटो के बीच जिस प्रकार से एक गुलाब खिलता है उसी प्रकार से हम सभी को हजारों विघ्न-बाधाओं के बीच भी मुस्कुराना है और दिल से ईद मुबारक हो का भाव सर्वत्र फैलाना है-" कब तक रहेगी ईद मुहर्रम बनी हुई , आओ कि जश्ने-शौक मनाने का वक्त है ; नजरों की तरह दिल भी करो फर्शे-राह तुम , हुजूर ये उनके बज्म में आने का वक्त है ". नजर और दिल साफ हो तो उस परम शक्ति का दर्शन जर्रे-जर्रे में हो जाता है;फिर कांटे भी फूल बन जाते हैं। 'शिष्य-गुरु संवाद' से डा.सर्वजीत दुबे🙏🌹