हानि-लाभ, जीवन-मरण,यश-अपयश विधि हाथ
May 29, 2020इम्तिहान -लॉकडाउन खत्म कर दें तो जान को खतरा है और लॉकडाउन चालू रखें तो जहान को खतरा। जिंदगी ऐसे नाजुक मोड़ पर कभी-कभी लाती है कि हर रास्ते से नुकसान ही आपके हिस्से में आना है। विवेक को यह देखना है कि किसे छोड़ दें और किसे बचा लें। प्रवासी मजदूरों के संक्रमित होकर घर लौटने से एक तरफ भयंकर अव्यवस्था पैदा हो गई तो दूसरी तरफ दूरदराज के इलाके भी खतरे में पड़ गए। प्रवासी मजदूरों को मिला जनसहयोग संकेत देता है कि इंसानियत जिंदा है किंतु सरकारी प्रयासों में कमी यह बता रही हैं कि हमारी व्यवस्था इतनी बड़ी जनसंख्या का दबाव सहने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में रास्ता क्या है? रामायण का एक प्रसंग मेरे ध्यान में आता है कि गुरु वशिष्ठ राजा दशरथ की मृत्यु पर और राम के वनगमन पर बिलख रहे भरत को कहते हैं कि" हानि-लाभ, जीवन-मरण,यश-अपयश विधि हाथ ". हे भरत!जो अपने वश में बात नहीं है,उसके लिए किसी को दोष देना और किसी पर क्रोध करना उचित नहीं है। राजा दशरथ के लिए इतना शोकाकुल मत होओ,वे शोक के योग्य नहीं है क्योंकि उन्होंने अपने कर्तव्य का भली-भांति पालन किया है। शोक के योग्य वे राजा होते हैं जो अपनी प्रजा का पुत्र के समान पालन नहीं करते हैं और शोक के योग्य वह प्रजा होती हैं जो अपने नागरिक धर्म का पालन नहीं करती। महासंकट की परिस्थिति हर एक से अपनी-अपनी भूमिका के निर्वाह की अपेक्षा करती हैं-'टिक पाएंगी कहां ये अंधेरों की साजिशें , रोशनी मिलेगी अगर हर मकान से ; वक्त पूछेगा कभी इत्मीनान से? किसने किया किनारा इस इंतिहान से?? - 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹