लोकल बनाम ग्लोबल- विज्ञान ने लोकल को ग्लोबल बनाया तभी तो कोई सुबह में ब्रेकफास्ट हिंदुस्तान में करके प्लेन से निकलता है,दोपहर का लंच यूरोप में करता है और रात का डिनर अमेरिका में। क्या ऐसा ग्लोबल मन आसानी से लोकल हो जाएगा? और क्या ग्लोबल तथा लोकल में कोई विरोध है? धार्मिक दृष्टि से लोकल और ग्लोबल में कोई विरोध नहीं है। राजनीतिक दृष्टि यह विरोध पैदा करती है। एक बीज का उदाहरण लीजिए। वह अपने विकास के लिए धरती के अंदर में अंधेरे में छुप जाता है। बीज का प्रस्फुटन दोनों तरफ होता है। वह धरती के नीचे लोकल होने के लिए जितनी अपनी जड़ें गहरी करता जाता है उतना ही धरती के ऊपर ग्लोबल होने के लिए अपने तने को बढ़ाते चले जाता है। बीज एक तरफ पाताल को स्पर्श करने की आकांक्षा करता है तो दूसरी तरफ आकाश को भी छू लेने की कामना से भरा होता है। इसीलिए वह फूल खिला कर गंध को हवाओं में बिखेर देता हैं- गंध ले जाती बिन मांगे हवा , देह जब से रातरानी हो गई ; बात इतनी सी कहानी हो गई , एक चुनर और धानी हो गई. संकट की घड़ी में व्यक्ति संकुचित होता है। यह उसकी जरूरत है और कुशल उपाय भी। अतः आज देश की ही नहीं ,राज्यों की भी सीमाएं एक दूसरे के लिए बंद होने लगीं हैं। किंतु लोकल के लिए वोकल होने का मंत्र क्या-क्या रूप दिखाएगा,यह आगामी दिन बताएगा। इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि अपनी शक्ति और संसाधनों की तरफ ध्यान जाएगा किंतु नकारात्मक पक्ष यह है कि एक-दूसरे से सीखने से और जुड़ने से हम वंचित हो जाएंगे। थोड़ा सोचें कि जितने भी वैज्ञानिक आविष्कारों और तकनीकों का हम आज प्रयोग कर रहे हैं, क्या वे ग्लोबल होने का परिणाम नहीं है? एक समय तक बच्चा मां के पेट में और मां एक छोटे से कमरे में सुरक्षा के लिहाज से बंद रहती है किंतु बड़े होने के साथ बाहर निकलना बच्चा की जरूरत भी है और विकास की आवश्यक शर्त भी। संकुचन और विकसन दोनों ही संभावनाएं हैं मनुष्य की। विवेक पर निर्भर है कि कब वह किसका चुनाव करता है? किंतु इतना निश्चित है कि संकुचन में ज्यादा समय तक नहीं रह सकता क्योंकि " घटे तो एक मुश्ते-खाक हैं इंसां ,और बढ़े तो वुसअते- कौनेन में समा न सके". 'वसुधैव कुटुम्बकम्'की घोषणा करने वाले भारतीय ऋषि की दृष्टि है- अहम् ब्रह्मास्मि -'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹