पर्यावरण-दिवस - किशोरी ग्रेटा ने विश्व के राष्ट्राध्यक्षों के समक्ष प्रश्न पूछा था-"आप लोगों ने नई पीढ़ी के लिए कैसी दुनिया छोड़ी हैं,जिसमें हम खुलकर सांस तक नहीं ले सकते? और क्या आपके खोखले शब्दों के लिए कभी माफ किया जा सकता है??" अब यह प्रश्न हर एक को स्वयं से पूछना चाहिए। मानव ने पर्यावरण को हर प्रकार से क्षति पहुंचाई।अब प्रकृति से निकले एक अदृश्य वायरस ने मानव को बाहर निकलने के लायक नहीं छोड़ा। यदि हमारी जीवन शैली यथावत बनी रही तो ऐसा भी समय आएगा कि जब हम घर में रहने लायक भी नहीं बचेंगे। पर्यावरण दिवस तो एक चेतावनी दिवस है। पर्यावरण के साथ हमारा संबंध प्रेम का हो, प्रतियोगिता या उपयोगिता का नहीं। किंतु हमारा प्रेम भी हार्दिक की जगह बौद्धिक हो गया है .... प्रस्तुत है हृदय के भाव-- " पंछियों के प्रति हमारा प्रेम उन्हें पिंजरे में बांध लाया,जानवरों के प्रति उमड़ा तो उन्हें खुले वन से नाथ लाया।(१) पर्वतों के प्रति हमारे प्रेम ने उन्हें उजाड़ बना दिया ,हरे-भरे चमन को निर्वस्त्र कर झंखाड़ बना दिया।(२) नदियों को हमने माता कहा और सारी गंदगी पिला दिया, मां के उपकार का हमने क्या गजब सिला दिया?(३) छायादार वृक्षों के उपकार को हमने पूरी तरह चुका दिया ,काटकर उसे मूल से घर के फर्नीचर पर सजा दिया।(४) बौद्धिक-प्रेम का कोरोना रुप में जवाब आया , जीवन जीने का एक नया अंदाज लाया।(५) ..... 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹