विश्वविद्यालय का गोल्डमेडलिस्ट सड़क पर खड़ा था , उपाधियों के ढेर तले उसका अरमान पड़ा था ; परीक्षा जिंदगी की आज वह फेल हो गया था, अनमोल सा हीरा बेमोल सेल हो गया था
June 14, 2020आनंदम् -उच्च-शिक्षा राजस्थान में वेबीनार के माध्यम से उच्च शिक्षा की स्थिति पर 9 जून 20 को हुए सार्थक विचार-विमर्श में शिक्षा-सचिव महोदया द्वारा आनंदम् पर विशेष जोर दिया गया। आनंदम प्रोजेक्ट विद्यार्थियों को सेवा और आनंद से जोड़ना चाहता हैं। समाज के लिए योगदान को Joy of giving से जोड़ने की सोच बहुत अच्छी हैं किंतु आदरणीया मैम ने इसे एक अन्य विषय की तरह जोड़ने की बात कही,जिसका पूरा विवरण डायरी या कागजात मेँ मेंटेन किया जाएगाऔर इसके लिए विद्यार्थियों को अंक भी प्रदान किया जाएगा। मेरी निजी सोच यह है कि ज्ञान के हर पहलू को प्राप्तांक से नहीं जोड़ा जाना चाहिए; खासकर आनंद को एकदम नहीं। क्योंकि निगाह यदि प्राप्तांक पर ठहर गई तो आनंद होना मुश्किल है। कड़वी सच्चाई यह है कि पढ़ाई आज भार बन गई है क्योंकि शिक्षालय जीवन- रूपांतरण की साधना-स्थली नहीं रहे बल्कि सिर्फ डिग्री बांटने वाले कार्यालय में तब्दील हो गए हैं। इसी कारण गोल्ड मेडलिस्ट विद्यार्थी भी अवसादग्रस्त हैं और आत्महत्या का शिकार हो रहे हैं क्योंकि लक्ष्य था-अच्छे प्राप्तांक द्वारा अच्छी नौकरी प्राप्त करना और वह नहीं मिली- "विश्वविद्यालय का गोल्डमेडलिस्ट सड़क पर खड़ा था , उपाधियों के ढेर तले उसका अरमान पड़ा था ; परीक्षा जिंदगी की आज वह फेल हो गया था, अनमोल सा हीरा बेमोल सेल हो गया था" ज्यों ही आनंदम् को अन्य विषयों की तरह अंकों से जोड़ा जाएगा तो यह एक भार की तरह होगा और इसमें अस्वस्थ प्रतियोगिता शुरू हो जाएगी। दिल्ली के विश्वप्रसिद्ध हैप्पीनेस क्लास के बारे में वहां के एक सफल शिक्षक ने बताया कि क्लास का कंसेप्ट तो बहुत अच्छा है किंतु रिकॉर्ड मेंटेन करने का भारी काम सबको अनहैप्पी बना रहा है। भारतीय संस्कृति के गुरुकुल में एक गुरु ने अपने विद्यार्थियों को कहा कि वर्षपर्यंत पढ़ाई का प्रमाण कल दिया जाएगा ,किंतु दो रूप में एक सैद्धांतिक और दूसरा व्यावहारिक । विद्यार्थियों को लिखित प्रमाण-पत्र वितरित कर दिए गए और उन्हें जाने को कहा गया। विद्यार्थी गांव की ओर जाते समय रास्ते में यही बात कर रहे थे कि दूसरा प्रमाण या परीक्षा लेना-देना तो गुरु जी भूल गए । खैर हमें तो अच्छी डिग्री मिल गई। अचानक रास्ते पर कांटे दिखाई पड़े । शाम हो रही थी तो कुछ विद्यार्थी रास्ते से नीचे उतर कर दूसरी तरफ चले गए और कुछ विद्यार्थियों ने लंबी छलांग लगाकर कांटा पार कर लिया। लेकिन एक विद्यार्थी रूककर कांटे को बीनने लगा। अन्य विद्यार्थियों ने कहा कि जल्दी चलो,कांटा बीनना छोड़ो। अंधेरी शाम हो रही है ,अंतिम नाव खुल जाएगी तो गांव जाने का कोई रास्ता नहीं बचेगा । किंतु कांटा बीनने वाले विद्यार्थी ने कहा कि अंधेरे में रास्ते पर पड़ा कांटा किसी को भी चुभ जाएगा,अतः इसे हटाना जरूरी है । अन्य विद्यार्थी उसको अकेले छोड़कर जाने लगे और वह कांटा बीनता रहा। तभी गुरु झाड़ियों से प्रकट हुए और सब को बुलाकर कहा कि परीक्षा में सिर्फ उत्तीर्ण यह कांटा बीनने वाला विद्यार्थी ही हुआ। अतः यह गांव जाने का हकदार है। बाकी सब आश्रम को लौटो,तुम लोगों की शिक्षा पूर्ण नहीं हुई। आज की शिक्षा भी अपूर्ण है।प्राप्तांक को सब कुछ बना दिया गया है।अतः शिक्षा भारयुक्त और प्रतियोगितापूर्ण हो गई है। मेरा अनुभव कहता है कि कोई भी बीज जब बड़ा वृक्ष होकर फल-फूल संपन्न हो जाता है तो वह देकर आनंदित होता है और बदले में धन्यवाद की भी अपेक्षा नहीं करता। किंतु वर्तमान में चल रही शिक्षा व्यवस्था ने सिर्फ मस्तिष्क बड़ा किया है,हृदय नहीं। आनंदम् हृदय की बात है , अतः इसे प्राप्तांक से जोड़ने की योजना पर व्यापक विचार-विमर्श होना चाहिए। हो सकता है कि आप मेरे विचार से सहमत न हों किंतु असहमति बता कर इस बात को आगे बढ़ाने की अवश्य कृपा करें क्योंकि आनंदम् संभावनाओं से भरा है।- डॉ सर्वजीत दुबे, कार्यवाहक प्राचार्य HDJGGirls College,Banswara🙏🌹