WAKE-UP for Class-Teaching :- महाविद्यालय छात्र-केंद्रित शैक्षणिक व सह-शैक्षणिक गतिविधियों के जीवंत केंद्र कैसे बन सकते हैं?- शिक्षा के केंद्र जीवंत बनते हैं अध्ययन और अध्यापन के माहौल से। ऐसे जीवंत केंद्रों से ही हममें से अधिकांश शिक्षक पढ़कर आए हैं, जिनके घर के पास ट्यूशन या कोचिंग के पैसे नहीं थे।लेकिन कॉलेज में हर विषय की नियमित कक्षाएं चलती थीं और शिक्षक के पास पढ़ने-पढ़ाने के अलावा अन्य कोई अतिरिक्त- कार्यभार नहीं था।वे शिक्षक हर टॉपिक् को इतने मनोरंजक और विविध ढंग से समझाते थे कि अन्यत्र जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी । इसके अतिरिक्त विद्यार्थी के किसी प्रकार के शंका-समाधान के लिए वे सदैव तत्पर रहते थे। उस समृद्ध परंपरा को पिछले 10-15 वर्षों से नवाचारों के नाम पर पूर्णतया तिलांजलि दे दी गई है- "परंपरा को अंधी लाठी से मत पीटो , उसमें बहुत कुछ है जो जीवन है, जीवनदायक है ; जैसे भी हो ध्वंस से बचा रखने के लायक है" .किंतु आज दुर्भाग्य से अध्ययन- अध्यापन के लिए जिस एकाग्रचितता और निश्चिंतता का माहौल शिक्षालय में होना चाहिए, उसका नितांत अभाव होता जा रहा है। 23 वर्षों की राजकीय सेवा में मैंने शिक्षालय को कार्यालय में तब्दील होते देखा है। एक समय था जब कॉलेज में सारी कक्षाएं नियमित रूप से चलती थीं और विद्यार्थियों की अच्छी संख्या सुबह 8:00 बजे प्रारंभ होने वाली कक्षा में भी होती थी और शाम 5:00 बजे समाप्त होने वाली कक्षा में भी। शिक्षकों की संख्या कॉलेज में अच्छी मात्रा में थी और सभी विषयों के पाठ्यक्रम समय पर पूर्ण करा दिए जाते थे। सत्र-पर्यंत शैक्षणिक गतिविधियों के अंत में सह शैक्षणिक गतिविधियों के लिए एक सप्ताह निर्धारित होता था। इनमें हर विधा में बेहतरीन प्रतिभाएं उभर कर आती थीं। किंतु धीमे-धीमे सह-शैक्षणिक गतिविधियां प्रमुख होती चली गईं और उनसे संबंधित सूचनाएं मांगने का काम बढ़ता चला गया। प्राचार्य के लिए उनकी सूचना भिजवाना प्रमुख होता गया, अतः नियमित कक्षाएं शनै:-शनै:गौण होती चली गईं। विद्यार्थी जिस विषय को पढ़ने के लिए कॉलेज में आते थे,उसकी पढ़ाई बाधित होने पर वे अधिकाधिक संख्या में ट्यूशन या कोचिंग की ओर उन्मुख हो गए। स्थितियां अब तो ऐसी हो गई हैं कि 1 दिन में एक साथ नियमित क्लासेज के समय में दो या तीन गतिविधियों को पूर्ण करा कर सूचनाएं भेजनी पड़ती हैं। सिलेबस को नजरअंदाज कर के नए समसामयिक विषयों पर चर्चाओं के श्रवण में विद्यार्थियों की रुचि नाममात्र की भी नहीं होती। शिक्षक आदेश की पालना में विद्यार्थियों को घेर कर अपने कार्यक्रम करा लेते हैं और सूचना भेज देते हैं।अन्य अनेक कारणों से नियमित क्लासेज निरंतर बाधित होने पर अपनी-अपनी कक्षाओं में आ रहे विद्यार्थी कॉलेज आना ही छोड़ देते हैं। कॉलेज में इतनी ज्यादा समितियां हैं और सबकी सूचनाएं इतनी बार मांगी जाती हैं कि शिक्षक को क्लास में जाकर पढ़ाने का भी अवकाश नहीं मिलता,पढ़ने की तो बात ही दूर हो जाती है। विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या शैक्षणिक-गतिविधियों की कीमत पर सह- शैक्षणिक गतिविधियां प्राथमिक और महत्वपूर्ण बना रहने दिया जाए? समसामयिक अथवा अन्य विषयों पर चर्चाएं आटे में नमक के बराबर हो तब तो चल सकती हैं किंतु हालत उलटी हो गई है;गौण प्रमुख बन गया है। एक तरफ तो कई विषयों के पढ़ाने वाले शिक्षक नहीं हैं और दूसरी तरफ स्कॉलरशिप का काम और खेल-शिक्षक के बिना क्रीड़ा- प्रतियोगिताओं का आयोजन और अन्य प्रकार के जनजागरूकता कार्यक्रमों का काम इतना बढ़ा दिया गया है कि हर शिक्षक अपने अंतर्मन में यही सोचता रहता है कि क्या उच्च शिक्षा में हम इसी के लिए आए थे? शिक्षक समुदाय अब घुटन महसूस करने लगा है और सोचने लगा है कि क्या सुनियोजित तरीके से क्लास-टीचिंग को पूर्णतया खत्म करने की योजना पर काम चल रहा है? इस दिशा में प्रतियोगिता-दक्षता कार्यक्रम जो कि क्लास के समय पर ही आयोजित किया जाता है और जिसकी सूचना नियमित भेजनी पड़ती है, विचार के योग्य है। कोई भी शिक्षक अपने क्लास और प्रतियोगिता दक्षता क्लास में से एक ही जगह उपस्थित हो सकता है, यह सच्चाई है। ऐसे में क्लास का महत्व कम हो जाता है क्योंकि प्रतियोगिता-दक्षता क्लास की रिपोर्टिंग करनी है। नियमित क्लासेज में शिक्षक विषय की गहराई और अवधारणा पर जोर देता है जबकि प्रतियोगिता-दक्षता क्लास में निर्धारित टॉपिक को सीमित समय में सिर्फ पूर्ण कर देना उद्देश्य होता है। यदि उच्च शिक्षा संस्थान को बचाना है तो क्लास टीचिंग की गुणवत्ता और नियमितता को उच्चतम स्तर पर ले जाना ही एकमात्र उपाय है। आधुनिक समय में कुछ नए टॉपिक्स (लैंग्वेज-स्किल व कौशल-विकास जैसे)को पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाना जरूरी लगता है तो पाठ्यक्रम में बदलाव कर लेना पर्याप्त होगा। मेरा मानना है कि इस बहुआयामी वैश्विक विपदा के समय में जब अधिकतर लोग गरीबी रेखा के नीचे आ गए हैं तो


शिक्षा संस्थान खासकर उच्च शिक्षा संस्थानों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होने वाली है। एक तरफ उनको ऐसे मन का निर्माण करना होगा जो संकटों में भी जूझ सके और दूसरी तरफ पाठ्यक्रम में ऐसे आमूलचूल परिवर्तन लाने होंगे जो देश-काल की अपेक्षाओं पर खरा उतर सके। इसके लिए शिक्षा-जगत के योजनाकारों में संवेदनशीलता और संवादशीलता के साथ अचानक हो रहे बदलाव की गहरी समझ और उसके समाधान की गहरी दृष्टि होनी चाहिए। यदि बेतुके प्रयोग शिक्षा जगत में चलते रहे तो कोचिंग कक्षाओं के महंगे बाजार जीवन निर्माण करने वाली शिक्षण-संस्थाओं के कीमत पर और ज्यादा फलते-फूलते जाएंगे जिसका अंतिम परिणाम यह होगा कि शिक्षा मात्र अमीरों के लिए उपलब्ध हो पाएगी और गरीब प्रतिभाएं सदा-सदा के लिए प्रतियोगिता परीक्षाओं के रेस से बाहर हो जाएगी। डॉ सर्वजीत दुबे,कार्यवाहक प्राचार्य,HDJGGC, Banswara.