गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर कन्या महाविद्यालय बांसवाड़ा के 25 वर्ष पूर्ण होने पर प्राचार्य के रूप में अपनी भावाभिव्यक्ति देते हुए मुझे गर्व की अनुभूति हो रही है। सर्वप्रथम अंधेरे जीवन में प्रकाश भरने वाले उन समस्त गुरुओं और शिक्षा-संस्थानों को मैं नमन करता हूं,जिनका ऋण कभी भी चुकाया नहीं जा सकता।। वस्तुतः शिक्षा संस्थान किसी भी क्षेत्र के सबसे जीवंत मंदिर होते हैं। एक चारदीवारी के भीतर विविधता में एकता प्रदर्शित करने वाली जीवंत आत्माएं भावी पीढ़ी के जीवन को सजाने-संवारने के यज्ञ में लगी होती हैं। कन्या महाविद्यालय परिवार के साथ मेरा निजी अनुभव एक विशेष थाती है जो मैं आप लोगों के साथ इस अवसर पर बांटना चाहता हूं। शिक्षा संस्थान का मूल्यांकन सिर्फ भौतिक संसाधन और संख्या के आधार पर करना न्यायोचित नहीं होगा क्योंकि इसमें वे सपने छूट जाते हैं जिसे पूरा करने के लिए महाविद्यालय परिवार का प्रत्येक सदस्य जी जान से लगा हुआ है- जहां कभी जेल की दीवारें थी , वहां आज चिड़ियां चहचहाती हैं ।रोज नए-नए गीत गाती हैं ,और अपने सपनों को सजाती हैं।। विकास-पुरुष श्री हरिदेव जोशी जी के नाम पर इस महाविद्यालय का नामकरण हुआ। यह स्थान वस्तुतः पूर्व में जेल परिसर ही था और आज बीच बाजार में बसा हुआ है। किंतु बीच बाजार में जेल की चारदीवारी के भीतर जनजातीय क्षेत्र की व अत्यंत गरीब परिवार की कन्याएं आकर कुछ पढ़ने-लिखने और सोचने- समझने का संस्कार यहां से ले जाती हैं। ज्ञान की बारिश तो शिक्षक सभी पर समान रूप से करते हैं किंतु कुछ बालिकाएं अपनी विशेष प्यास के कारण ज्ञान की बूंदों को मोती बना देती हैं। मेरा एक संस्मरण है। मैं उस दिन छुट्टी पर था।फिर भी प्राचार्य का फोन आया कि आप महाविद्यालय तुरंत पधारें क्योंकि विश्वविद्यालय द्वारा भेजे गए गोल्डमेडल को और प्रमाणपत्र को एक बालिका को सबके समक्ष देना है और इस अवसर पर शिक्षकों की तरफ से आपको बोलना है। मुझे विशेष गौरव की अनुभूति हुई और इस संस्थान के इस सोच का पता चला कि अंधेरी रात में एक बिजली चमकने के अवसर को महाविद्यालय परिवार सभी बालिकाओं के सामने उनको प्रेरणा देने और आंख खोलने हेतु रखना चाहता है। मेरे भी दिल से यही बात निकली कि इस पिछड़े क्षेत्र से अत्यंत गरीब परिवार की बालिका शिक्षकों के मार्गदर्शन से उदयपुर जैसे अगड़े(Modern) क्षेत्र में स्थित विश्वविद्यालय की टॉपर बन जाती है। संदेश साफ है कि परिस्थिति नहीं मन: स्थिति महत्वपूर्ण है। यदि महाविद्यालय परिसर के भीतर एक बीज खिलकर फूल बन सकता है और उसकी सुगंध दूर-दूर तक जा सकती है तो यह इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि अन्य बालिकाएं भी क्लास में आकर अपनी सोच और जीवन बदल सकती हैं। और घर पर जाकर सभी मेहनत करें तो और भी टॉपर यहां से निकल सकती हैं। और कॉलेज के नाम और भी गोल्डमेडल आ सकते हैं। अब तक कन्या महाविद्यालय (होम-साइंस)की 5 छात्राएं गोल्ड मेडल पा चुकी हैं जबकि पांच पद का भार अकेले एक प्रोफेसर निर्वाह कर रही हैं। इससे हमारे महाविद्यालय परिवार के शिक्षकों की प्रतिभा और समर्पण का पता चलता है। सिल्वर जुबली के अवसर पर अब इस संस्था का प्राचार्य होने के नाते समाज और सरकार से मेरा इतना ही विनम्र निवेदन है कि- "समाज से कह कन्याओं को थोड़ा और अवकाश दे दे , और सरकार से गुजारिश है एक खुला आकाश दे दे। " परिवार -समाज बालिकाओं को कॉलेज तक पहुंचने की सुविधाएं दे तथा उन्हें अपना पूरा विश्वास दे और सरकार अपनी सहयोग दृष्टि बनाए रखे कि महाविद्यालय परिवार के सदस्यों की संख्या में आगे बढ़ोतरी ही हो।तब मुझे पूरा विश्वास है की पढ़ाई के साथ आगे खेल तथा अन्य क्षेत्रों में भी 5 गोल्ड मेडल की संख्या 50 तक पहुंचाई जा सकती है। गुरु पूर्णिमा की हार्दिक बधाई के साथ कन्या महाविद्यालय के सिल्वर जुबली के अवसर पर मंगलकामना सहित। .. डॉ सर्वजीत दुबे प्राचार्यHDJGGC,BANSWARA🙏🌹