[7/9, 5:57 AM] Sarabjeet Dubey: "विकास" केंद्रित राजनीति - फल बताता है कि बीज कैसा बोया गया था। विकास दुबे रूपी बीज के बारे में सबको मालूम था किंतु सबने उसमें खाद-पानी डाला और उसकी सुरक्षा की। बदले में अपने तात्कालिक हितों को साधा गया। जब वह विषवृक्ष बनकर समाज और सत्ता को चुनौती दे रहा है तो उसे जड़-मूल से काटने की बात की जा रही है। लेकिन एक वृक्ष बड़ा होकर अनगिनत बीजों को जन्म दे चुका होता है। तभी तो उसके संपर्कसूत्र और समर्थक सर्वत्र मिल रहे हैं। भस्मासुर की कथा कहती है कि शिव जी का आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद सबसे पहले उन्हीं के मस्तक पर हाथ रखकर वह महादेव को ही खत्म करना चाहता था। योग्यता के बिना शक्ति प्राप्त करने की आकांक्षा पहले अपराध की दुनिया में ले जाती थी किंतु अब राजनीति की दुनिया ने बहुत अच्छी आश्रय-स्थली प्रदान कर दी है। अब घड़ियाली आंसू बहाए जा रहे हैं कि *राजनीति और अपराधी का गठजोड़ कैसे समाप्त किया जाए?- "दास्तां-ए-सियासत का अदना सा फसाना है , बस्ती भी जलानी है और मातम भी मनाना है". * ज्ञान प्रधान संस्कृति वाले भारत का समाज आज राजनीति-प्रधान हो गया है। राजनीति ही हमारे जीवन के सभी आयामों के लिए नीति बनाने का काम कर रही है और उसे लागू करवाने का भी। अतः राजनीति में जाने वालों के लिए पूर्व-प्रशिक्षण और योग्यता-निर्धारण का क्या उचित समय नहीं आ गया है? विकास दुबे का मकान गिरा देने से और उसे मार देने से भी कुछ नहीं होगा-" वरांगनेव नृपनीतिरनेकरुपा " अर्थात् वेश्या के समान राजनीति अनेक रूप दिखाती है। कुछ ठोस कदम उठाने का विचार हो तो बाणभट्ट द्वारा विरचित शुकनासोपदेश बहुत बड़ा मार्गदर्शन देता है। युवराज पद देने के पहले अपने बेटे चंद्रापीड़ को राजा तारापीड़ विद्वान शुकनास के पास पूर्व-प्रशिक्षण के लिए भेजते हैं।शुकनास अपने उपदेश के प्रारंभ में ही स्पष्ट कर देते हैं कि धन,शक्ति,युवावस्था और अविवेक - इसमें एक,एक भी बहुत बड़ा अनर्थ करने में समर्थ हैं।विकास दुबे जैसे व्यक्तित्व में जहां चारों एकत्र हो जाते हैं, वहां के अनर्थ की कल्पना भी नहीं की जा सकती।। लक्ष्मी के स्वरूप का वर्णन करते हुए वे कहते हैं कि यह अनार्या,चंचला और तमोगुण बहुला है। आज चुनाव के समय में नेताओं की बाड़बंदी पर्याप्त प्रमाण दे रही हैं कि लक्ष्मी जी क्या-क्या गुल खिला सकती हैं? आखिर राजनीतिक दलों को अपने लक्ष्मी जी का स्रोत पारदर्शी बनाने में क्या दिक्कत है? पद और शक्ति के प्राप्त होने के बाद सत्ता का अहंकार किस प्रकार से स्वभाव को बदल देता है, उसका सुंदर वर्णन करते हुए वे कहते हैं कि पदाभिषेक के अवसर पर मंगल कलश के जल से हृदय की उदारता मानो धो दी जाती है। आज भी हम देखते हैं कि जो नेता चुनाव के पूर्व हाथ जोड़े घर-घर पहुंचता है, वही मंत्री बन जाने के बाद अपने हाथों को जनता की गर्दन तक पहुंचा देता है।अहंकारवश अपने आप को देवता मानकर अपना दर्शन देना भी जनता पर उपकार समझने लगता है।। उसके चारों ओर ऐसे चापलूस घेरा बना लेते हैं जो दिन-रात उसकी स्तुति कर उसके आंखों पर पर्दा डाल देते हैं,जिसके कारण उसे कुछ भी सत्य रूप में दिखाई नहीं देता। जब राजतंत्र में अपना वंशानुगत अधिकार देने के पहले राजा भी अपने पुत्र तक का प्रशिक्षण दिलवाकर ही पद देता था तो आज प्रजातंत्र में हम भारत के लोग अपने प्रतिनिधि को अधिकार देने के पूर्व क्या किसी प्रशिक्षण या योग्यता की जरूरत को महसूस नहीं करते?- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹


[7/9, 6:12 AM] Sarabjeet Dubey: शुकनासोपदेशस्य उपयोगिता आधुनिक संदर्भे विशेषकर विकास दुबे संदर्भे :- राजनीति अस्माकं जीवनस्य कृते नीति-निर्माणं करोति- समाज-धर्म-शिक्षा-व्यवसाय संबंधी- सर्वेभ्य:क्षेत्रेभ्य:।" यथा राजा, तथा प्रजा " आदर्श-वाक्य: कथयति- नेतृणाम् आचार-व्यवहारस्य अनुसरणं सामान्यजनेन क्रियते। अद्य राजतंत्र: नास्ति , लोकतंत्र:अस्ति। किंतु जनप्रतिनिधिनाम् व्यवहार: राजा इव दृश्यते। अहंकार: च भ्रष्टाचार:च उच्च-पद-स्थित-नेतृषु दृश्यते। सत्ता भ्रष्टं करोति। अतः शुकनासोपदेशे युवराज पद हेतु राजकुमार-चंद्रापीडम् प्रति उपदेशम् दीयते शुकनास-द्वारा । विद्यायुक्त-शुकनास: कथयति प्रारंभे-" गर्भेश्वरत्वमनवभियौवनत्वं..खल्वनर्थ परंपरा "- अर्थात् यौवन,धन, शक्ति इत्यादि कस्मिन् अपि जने दुर्गुणानां-केंद्रनिर्माणम् कुर्वंति। अतः पूर्वप्रशिक्षणस्य- आवश्यकता अस्ति। गुरुनाम् उपदेश: दुर्गुणानाम् दूरीकरणे समर्थ:भवति। अद्यापि नेतृणाम्-कृते प्रशिक्षणस्य आवश्यकता अनुभूयते। कारणमस्ति धन-प्रभावेन जनप्रतिनिधिनाम् क्रय-विक्रय व्यवस्था स्पष्टरूपेण दृश्यते,यथा पशुनाम्-कृते बाड़बंदी क्रियते। शुकनास:भावी-युवराजं प्रति कथयति लक्ष्मी-स्वरूपम् - लक्ष्मी: अनार्या, चंचला, तमोगुण बहुला भवति। चुनावकाले नेतार:विनम्रा: भवंति किंतु पदप्राप्ति पश्चात् तेषाम् स्वभावे अहंकारस्य प्रवेश: भवति; इदम् प्रतीयते यत् पद-अभिषेक- अवसरे मंगल-कलश-जलेन तेषाम् उदारता दूरी क्रियते। यज्ञ-धूम्रेण हृदय:मलिन:भवती। धूर्ता: जना: राजानम् परित: स्तुतिम् कुर्वंति। अनेन राजा स्वम् देव: मन्यते। राजा-प्रजा मध्ये वार्तालाप:न भवति। शुकनासोपदेश: एक: मनोवैज्ञानिक ग्रंथ: अस्ति ।वयं पश्याम:यत् अद्यापि जनसेवकानाम्आचरण: राजा इव प्राप्यते। नेतृणाम् मनोविकार-दूरी- करणाय शुकनासोपदेशस्य उपयोगिता अस्ति,अद्यापि विशेषरूपे।- शिष्य-गुरु संवाद केंद्रत: डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹