"Joy of givingको विद्यार्थियों में किस प्रकार पल्लवित किया जा सकता है?" :- उच्च शिक्षा राजस्थान में इस प्रश्न पर शिक्षकों को विचार देने के लिए कहा गया। मेरी राय में बीज कुछ भी देने की स्थिति में नहीं होता है। किंतु यदि बीज वृक्ष बन जाए और फल-फूलों से लद जाए तो बिना दिए वह रह भी नहीं सकता है। विद्यार्थी बीज है । इस बीज की संभावनाओं को वास्तविकताओं में बदलने की जिम्मेदारी शिक्षण-संस्थाओं की होती हैं। यदि शिक्षकों को अपना ज्ञान विद्यार्थियों में बांटने हेतु समस्त सुविधाएं मिल जाए तो शिक्षक को सबसे ज्यादा आत्मसंतुष्टि मिलती है। जब विद्यादान से विद्यार्थी योग्य बन जाता है तो Joy of giving की अनुभूति शिक्षक की दोगुनी हो जाती है क्योंकि उसका बोया गया बीज आज वृक्ष बन गया और फल-फूलों से लदकर दुनिया को बांटने के लिए तैयार हो गया है। "नर:सर्वत्र विजयम् इच्छेत्, पुत्रात् शिष्यात् च पराजयम्" गीता कहती हैं कि सर्वत्र विजय की कामना करने वाला मनुष्य पुत्र और शिष्य से पराजित होने की कामना करता है क्योंकि पिता अपने पुत्र को और शिक्षक अपने शिष्य को अपने से ज्यादा ऊंचाई पर पहुंचा देता है तो उसके आनंद का कोई ठिकाना नहीं होता । बीज जब पेड़ बनकर फल-फूलों से लद जाता है तो उसकी छाया में लोग विश्राम भी पाते हैं उसके पके फलों को खाते भी हैं और उसके फूलों की सुगंध हवाओं में दूर-दूर तक फैल कर वातावरण को सुवासित भी कर देती है- किस पर करते कृपा वृक्ष यदि अपना फल देते हैं? गिरने से पहले उसको वे क्यों रोक नहीं लेते हैं?? कोई भी विद्यार्थी जब अच्छे शिक्षालयऔर शिक्षक को पाकर ज्ञान तथा कला से समृद्ध हो जाता है और अपने पैरों पर खड़ा हो जाता है तो जिस परिवार और समाज से कुछ पाया था, उसे देकर बहुत आनंदित होता है। यह प्रकृति का नियम है क्योंकि- "ऋतु के बाद फलों का रुकना डालों का सड़ना है, मोह दिखाना देय वस्तु पर आत्मघात करना है" . शिक्षालयों के प्रवेश-द्वार पर भी लिखा हुआ मिलता है- ज्ञानार्थ प्रवेश,सेवार्थ प्रस्थान । किंतु दुर्भाग्य है कि आज का सरकारी शिक्षालय गैर- शैक्षणिक कार्यों के भार से दब गया है और सूचना आदान-प्रदान के तनाव से भर गया है। इस शिक्षाजगत में अनेकों ऐसे शिक्षक हैं जिन्होंने गरीबी की पृष्ठभूमि के बावजूद अच्छे शिक्षकों के सानिध्य से अपना जीवन खिलाया है। ऐसे शिक्षक काफी कुछ देना चाहते हैं और विद्यार्थियों के जीवन को संवार कर उन्हें देने की क्षमता वाला बनाना चाहते हैं ताकि वे भी अपने देने के आनंद को दुगुना कर सकें। विडंबना यह है कि आज बीज से और छोटे पौधे से अपेक्षा की जा रही है कि वे देने का आनंद सीखें और जानें।। यह संभव नहीं ;क्योंकि उनके पास देने को आज कुछ है ही नहीं। भारतीय संस्कृति में स्वार्थ शब्द बहुत अद्भुत अर्थ में प्रयुक्त होता था- स्वस्य अर्थ: अर्थात् सबसे पहले अपने जीवन का अर्थ (उद्देश्य) ढूंढो, तब परमार्थ (दूसरों की सेवा) स्वयंमेव होने लगता है। .....इसी कारण से गुरुकुलों को समाज और सरकार द्वारा समस्त सुविधाएं प्रदान की जाती थीं ताकि एकांत में शिक्षक अपने विद्यार्थियों के जीवन को पूरे ध्यान से ज्ञान-कला से संपन्न बना सके।। फिर दीक्षांत समारोह का आयोजन होता था ,जिसमें शिक्षक अपने विद्यार्थियों को गुरुकुल में प्राप्त ज्ञान-कला को सर्वत्र बांटने का उपदेश देता था। जैसे भरे हुए बादल स्वयमेव बरसने लगते हैं, वैसे ही प्रशिक्षित विद्यार्थी अपना सर्वस्व बांटने लगते थे और जितना अपना ज्ञान-कला बांट पाते थे ,उतना ही ज्यादा उनका जीवन आनंद से भर जाता था। बीज को भूमि के अंदर अंधेरे में बोना पड़ता है और प्रतीक्षा करनी पड़ती हैं- पनपने दे जरा आदत निगाहों को अंधेरों की , अंधेरे में अंधेरा रोशनी के काम आएगा । पलक पर और बढ़ने दे जरा सा इस समंदर को , तभी तो मोतियों का और ज्यादा दाम आएगा ।। अतः एक कहावत है कि एक साल की योजना हो तो किसान बनो और 100 साल की योजना हो तो शिक्षक। जो विद्यार्थियों के साथ हो रहा है,यही वृक्षारोपण के संबंध में भी है। हर साल करोड़ों पौधे लगाने के फोटो समाचारपत्रों में छपते हैं किंतु कितने पौधे वृक्ष बन कर फल- फूलों से लदे मिलते हैं? यदि किसी कॉलेज में कहीं भी GREEN-CAMPUS नहीं दिखाई देता, तो इसका मतलब है कि माली नहीं है जो पौधों की सुरक्षा कर सके। उन मुरझाए पौधों से यदि कोई देने के आनंद की बात करे तो इसका मतलब है कि- या तो यथार्थ की जानकारी नहीं है या जानबूझकर यथार्थ को नजरअंदाज किया जा रहा है । कवि दुष्यंत की बात मानें तो- पौधे झुलस गए हैं मगर एक बात है ,उनकी नजर में अब भी चमन है हरा-हरा ; माथे पे रख के हाथ बहुत सोचते हो तुम ,गंगा कसम बताओ आखिर क्या है माजरा? जो भी शिक्षक शिक्षाजगत का कल्याण चाहते हैं,वे वास्तविक परिस्थिति को बताएं और यह भी बताएं कि अगर विद्यार्थी में सचमुच जॉय ऑफ गिविंग का भाव जगाना चाहते हैं तो शिक्षकों को पर्याप्त सुविधा और शैक्षिक माहौल उपलब्ध कराइए ताकि शिक्षक स्वयं देने के आनंद से भर सके। फिर विद्यार्थी में वह देने का आनंद स्वयं ही संचरित हो जाएगा।-'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹