कुलपति जी का आभार -विश्वविद्यालय और कुलपति जब एक अत्यंत पिछड़े इलाके में आते हैं तो उस क्षेत्र को मानो पंख लग जाता है। आज विदाई के अवसर पर कुलपति जी को मैं अपनी नजरों से देखने की अपेक्षा उनको उनकी नजर से ही देखना पसंद करूंगा - जहां खो जाते हैं राहो-मंजिल , उनको उस डगर से देखा है । खुद को देखा है उनकी आंखों से , उनको उनकी नजर से देखा है।। बांसवाड़ा में GGTU के शिफ्ट किए जाने के बाद स्थानीय स्तर पर तीन व्याख्याता और एक वित्त-नियंत्रक मिलकर जीजीटीयू के काम को आगे बढ़ा तो रहे थे किंतु प्रो. के.सी.सोडानी सर के कुलपति के रूप में पदभार ग्रहण करते ही उन कामों में स्पष्टता और गति आ गई। उनके सौम्य स्वभाव और प्रैक्टिकल अप्रोच से हमें बहुत कुछ सीखने को मिला। उन्होंने मुझे अकादमिक प्रभारी का कार्यभार सौंपा और मार्गदर्शन देते हुए कहा कि नियमित क्लासेज चलाने के साथ हर महत्वपूर्ण दिवस और गतिविधियों पर चर्चा कराना ,उसकी रिपोर्ट बनाना और समाचारपत्रों के माध्यम से समाज तक उसकी खबर पहुंचाना मुख्य जिम्मेवारी होगी। इसी के साथ सेमिनार का आयोजन कर समाज के निचले पायदान तक गंभीर चिंतन-मनन का वातावरण बनाने का दायित्व भी अकादमिक प्रभारी को निभाना होगा। भौतिक संसाधनों के अभाव के बावजूद कुलपति जी के आइडिया के कारण नियमित क्लासेज और नियमित चर्चाएं क्षेत्र के आकर्षण का केंद्र बन गईं। शून्य से यात्रा प्रारंभ हुई थी किंतु उनके आते ही कलेक्ट्रेट परिसर में प्रशासनिक भवन का मार्ग प्रशस्त हो गया। लेकिन अकादमिक गतिविधियों का निरीक्षण करने हेतु वे बराबर गोविंद गुरु कॉलेज के पिछले भाग में स्थित अपने अकादमिक भवन में आते रहे। उन्होंने मुझसे सुझाव मांगा कि इस जनजातीय क्षेत्र के अनुकूल कोई विशेष गतिविधि बताइए जो सीधे विद्यार्थी हित से जुड़ा हो। मैंने निवेदन किया कि यहां के विद्यार्थियों के" अभिव्यक्ति कौशल " सुधार हेतु कुछ विशेष किया जाना चाहिए। तत्काल रुप से एक क्लास अभिव्यक्ति कौशल संवर्धन हेतु कुलपति महोदय ने शुरू करा दी।चूंकि यह क्लास सभी विद्यार्थियों के लिए ओपन थी ,अतः अकादमिक भवन वागड़ क्षेत्र की प्रतिभाओं को अपनी ओर आकर्षित करने लगा। फिर कुलपति जी ने इच्छा जताई कि नियमित क्लासेज के अतिरिक्त शाम के समय में प्रतियोगिता परीक्षाओं की कोचिंग हेतु योजना बनाई जाए ताकि अधिक से अधिक विद्यार्थी विश्वविद्यालय से जुड़ सकें। REET कोचिंग हेतु कार्यशाला का आयोजन अकादमिक भवन में किया गया जिसमें विद्यार्थियों का उत्साह एक नए रूप में सामने आया। लगभग 500 विद्यार्थियों ने कोचिंग हेतु फॉर्म भरा, जिसमें से 120 का सिलेक्शन कर विषय विशेषज्ञों की मदद से विश्वविद्यालय के अकादमिक भवन ने प्रतिभाओं को मार्गदर्शन देने का काम बखूबी अंजाम दिया। अकादमिक भवन में विद्यार्थियों के मार्गदर्शन हेतु सतत आना और शैक्षिक माहौल को आगे बढ़ाने के लिए नए-नए आइडिया देना कुलपति जी को विशेष प्रिय था। शिक्षक- दिवस पर अकादमिक-भवन में अपने दिए संबोधन में उन्होंने कहा था- वागड़ में पढ़ने-पढ़ाने का जुनून पैदा करना होगा क्योंकि लंदन में मैंने देखा कि ट्रेन यात्रा के दौरान भी लोग किताबें पढ़ते हैं। उनके मार्गदर्शन और आइडिया को मूर्त रूप देने में अकादमिक भवन के सदस्यों ने कोई कोर-कसर न छोड़ी। हर अच्छे काम की खुले मंच से तारीफ कर कुलपति जी ने शैक्षिक वातावरण को ऊर्जा एवं उत्साह से भर दिया। अकादमिक भवन द्वारा विश्वविद्यालय के LOGOनिर्माण का कार्य हो अथवा विचार निर्माण का कार्य सबको ऊंचाइयां प्रदान करने में उनकी आत्मीयता को मैं याद करता रहूंगा-"एक अक्षर प्रदान करने वाले के प्रति भी हमारी संस्कृति ऋणी होने का उपदेश देती है। फिर जिनसे बहुत कुछ सीखने का मौका मिला हो ,उनसे उऋण होने हेतु शब्द पर्याप्त नहीं है।विद्यार्थियों के जीवन से जुड़ कर उनमें जागरण लाने हेतु सतत लेखन करता रहूं और शैक्षिक वातावरण निर्माण हेतु ईमानदार प्रयास करता रहूं तो उनके प्रति सही आभार व्यक्त हो सके- पंख दिए हो तो आकाश भी चाहिए , अंधेरी रातों में नित नूतन प्रकाश भी चाहिए डॉ सर्वजीत दुबे (कार्यवाहक-प्राचार्यHDJGGC, BANSWARA)- कुलपति जी के स्वस्थ एवं सार्थक जीवन की परमात्मा से प्रार्थना करता हूं ....🙏🌹