प्रतिभा और प्रतिकूलता-सुशांत के आत्महत्या की गुत्थी सुलझने के बजाय उलझती जा रही है। भाई- भतीजावाद और भेदभावरुपी काले बादल के पीछे यह सूर्य कुछ देर के लिए छुप तो सकता था किंतु सदा के लिए वह अस्त नहीं हो सकता था। सुशांत राजपूत की पीड़ा कर्ण और अंबेडकर की पीड़ा के समान है जो जन्म और जाति के कारण हर प्रकार के प्रोत्साहन और प्राप्तव्य से वंचित हो जाते हैं। लेकिन जितने ज्यादा इनको नाइंसाफी के शूल चुभते चले जाते हैं, उतने ही ज्यादा वे अपनी प्रतिभा का फूल खिलाते चले जाते हैं। अंत तक संघर्ष करना और बात है किंतु संघर्ष को बीच में ही छोड़कर इस दुनिया से चले जाना कुछ और। यह सत्य है कि बॉलीवुड में Nepotism- Groupism ने सुशांत की आंखों के सामने साकार होते कई सपनों को षडयंत्रपूर्वक छीन लिया और बाहरी होने के कारण उपेक्षा का शिकार उन्हें होना पड़ा किंतु यह भी सत्य है कि कई सपनों को उन्होंने उसी इंडस्ट्री में परवान चढ़ाया। आउटसाइडर होने से आपको कुछ लोग हर मौके पर नीचा दिखाना चाहते हैं तो ऐसे संकीर्ण लोगों को आप व्यापकदृष्टि वाला नहीं बना सकते हैं लेकिन ऐसे क्षुद्र लोगों से स्वयं को बचाने की कला तो विकसित कर सकते हैं। बहुत बड़े झटके की परिस्थिति में घनघोर निराशा तो स्वाभाविक है किंतु आत्महत्या तो पूर्णरूपेण अस्वीकृत है। प्रतिकूल परिस्थितियों को झेलने की क्षमता का नाम ही प्रतिभा है। प्रतिकूलताएं ही आपको निखारती हैं- "क्यों दूर हट के जाएं हम दिल की सरजमीं से , दोनों जहां की सैरें हासिल है सब यहीं से ; यह राज सुन रहे हैं एक मौजें तहनशीं से , डूबे हैं हम जहां पर उभरेंगे फिर वहीं से". एक उभरते सितारे की संघर्षगाथा उसके आत्महत्या की कहानी से मेल नहीं खाती। यह उन करोड़ों सितारों को गलत संदेश दे रही है जो अपनी चमक पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। राम को 14 बरस और पांडवों को 13 वर्ष का वनवास यह संदेश देता है कि अपनी छोटी मोटी असफलताओं और उपेक्षाओं को बड़ा करके मत देखो। इसके विपरीत अपने धैर्य और सहनशीलता को बढ़ाओ क्योंकि स्वर्ण को निखरने के लिए उसका घिसा जाना, छेदा जाना, तपाया जाना और पीटा जाना अनिवार्य शर्तें हैं। क्या अमिताभ बच्चन जी ने ऐसी प्रतिकूलताओं को नहीं झेला? फॉलोअर्स और लाइक्स की संख्या को फर्जी तरीके से बढ़ाने और घटाने के रैकेट का पर्दाफाश हुआ है। आखिर दूसरों के कमेंट से आपका आत्म- मूल्यांकन कैसे हो सकता है? डिप्रेशन और आत्महत्याओं के इस दौर में जब तक आत्मज्ञान की शिक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी तब तक आत्महंताओं की संख्या बढ़ती जाएगी।-'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹