बोर्ड-परीक्षा के प्राप्तांक के द्वारा नई पीढ़ी एक नई दुनिया में प्रवेश करती है। बरसों की साधना के मूल्यांकन का आधार एकमात्र अंक ही होता है। एक तरफ उच्च-प्राप्तांक प्राप्त करने के बाद माता-पिता के साथ मिठाई खाते माला पहने विद्यार्थियों की तस्वीरें सामने आती हैं तो दूसरी तरफ कम अंकों के कारण अलग-थलग पड़ जाने पर अकेले में सुसाइड कर लेने की खबरें भी।. Superiority complex और Inferiority complex की दो भावधाराओं से वातावरण उत्तेजनापूर्ण बन गया है। एक तरफ कुछ विद्यार्थी 90% से ऊपर अंक प्राप्त करने के बाद भी 100परसेंट अंक प्राप्त करने के लिए पुनर्मूल्यांकन का फॉर्म भर रहे हैं तो दूसरी तरफ असफल या कम अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी " यह जीवन किसी काम का नहीं "इस भाव से भर रहे हैं। विद्यार्थी सफल होता है तो माता-पिता और शिक्षकों को उसका श्रेय दिया जाता है किंतु असफल होता है तो सिर्फ और सिर्फ विद्यार्थी ही जिम्मेवार होता है, मां-बाप और परिवार तक उसके साथ खड़े नहीं होते। प्रतियोगिता की यह दुनिया अजीब दुनिया है क्योंकि जिसको सहारे की जरूरत है,उसके पास कोई खड़ा नहीं होता और जिसके साथ सफलता खड़ी है,उसके आसपास सब आ जाते हैं। जरूरत है उस संतुलित मानसिक दशा की जिसमें न अहं-भाव पैदा हो और न हीन-भावक्या COMPLEX-LESS (ग्रंथि-विहीन) व्यक्तित्व की कोई संभावना नहीं है? महत्वाकांक्षी-चित कहीं भी संतुष्ट नहीं होता और हीन-भावना से ग्रसित चित्त अपने को किसी काम के योग्य ही नहीं मानता। इन दोनों चितों के कारण दुनिया नर्क बनी जा रही है। शत-प्रतिशत अंक प्राप्त करने के बाद भी जब मनचाहे इंस्टिट्यूट में मनचाहा सब्जेक्ट नहीं मिलता तो सवाल उठता है कि इससे ज्यादा और क्या चाहिए? दूसरी तरफ असफल विद्यार्थियों को जब अपने माता-पिता और परिवार का ही सहारा नहीं मिलता तो उनके मन में एक सवाल उठता है कि फिर इस दुनिया में मेरी जगह कहां है? अतः शिक्षाविदों और मनस्विदों ने इतने ज्यादा अंक देने वाली पद्धति पर और असफल बच्चों के साथ माता-पिता या परिवार के न खड़ा होने की सोच पर सवाल उठाए हैं। गुजरात के IASनितिन जी ने तो अपना बोर्ड परीक्षा का न्यूनतम मार्क्स तक सार्वजनिक कर दिया और संदेश दिया कि एक परीक्षा की असफलता जीवन को सफल होने से नहीं रोक सकती। काश!हम बोर्ड परीक्षा के परिणाम में हर विद्यार्थी के जीवन का वह आयाम खोजने का प्रयास करते, जिसके लिए वह बना है और जिस बीज को विकसित कर वह स्वयं के जीवन की सार्थकता पाता। यह संभव हो सकता है जब शिक्षा हमारी प्राथमिकता में हो और शिक्षाविदों के साथ मनस्विदों को भी हर विद्यालय में पर्याप्त संख्या में लगाकर जीवन रूपी बीज को पहचानने और सजाने- संवारने में लगा दिया जाए। आत्मनिर्भर-भारत का सपना सच करने की शक्ति सिर्फ उत्कृष्ट शिक्षालय में है,जो इंसान को भगवान बनाने की क्षमता रखने के कारण मंदिर के समान है- जमाने में भले दिखता हो अंतर आपमें हममें , यह मंदिर है ,यहां कोई खरा-खोटा नहीं होता । परीक्षा जिंदगी की पास करना है बहुत मुश्किल , कि इसमें एक भी उत्तर रटा-घोटा नहीं होता - 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹