नियम तो साफ़ है पर नीयत?
July 29, 2020"नियम तो साफ़ है पर नीयत?" - संविधान के नियम हों या जीवन- जगत के नियम हों, उनमें कोई जटिलता नहीं है। नियम बहुत साफ और सरल होते हैं ताकि सभी के लिए समझना और पालन करना आसान हो। किंतु नियमों की व्याख्या मन करता है जो बहुत ही जटिल और इनोवेटिव हैं। प्रकाश का कोई रंग नहीं होता किंतु प्रिज्म से गुजर कर सात रंगों में बंट जाता है- "सादा सरल जीवन था लेकिन बहुत जटिल अनुवाद हो गया". गांधी ,नेहरू,पटेल,सुभाष जैसे महापुरुषों के मतभेद जगजाहिर है किंतु सभी एक दूसरे का अंतरतम से आदर करते थे क्योंकि सभी का मन साफ-सुथरा था,अतः उनमें मतभेद के बावजूद मनभेद मुखर न हो सका। आज एक ही मत के लोग भिन्न-भिन्न मन वाले हो चुके हैं। " कहीं पे निगाहें,कहीं पे निशाना " की प्रवृत्ति वाले लोगों को समझ पाना इंसान क्या भगवान के भी वश में नहीं रहा। एक रेल- दुर्घटना पर रेलमंत्री पद से इस्तीफा देने वाले शास्त्री जी और एक मत के अंतर से अपनी सरकार गंवाने वाले अटल जी की नीयत और अंतरात्मा इतनी साफ-सुथरी थी कि सभी के दिलों में सदा के लिए अमर हो गए। क्या अंतर पड़ता है विचारधारा और नियम से यदि नीयत और अंतरात्मा साफ हो? कहानी कहती है कि एक ऋषि ने बदमाशों की नीयत भांपकर 10 वर्षों से सच बोलने का पाला हुआ अपना नियम तोड़ दिया ताकि लड़की की जान बच जाए। किंतु आज हर महापुरुष नियम की रक्षा में लगा हुआ है फिर भी संविधान खतरे में पड़ता जा रहा है-" यह कौन सी धूप है इस महानगर में दोस्तों , आत्मा तो छोटी हो गई परछाइयां बढ़ती गईं। वे ज्यों-ज्यों पास आते गए , खाइयां बढ़ती गईं।।'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹