भूमि-पूजन से भूमिका-सृजन तक : अयोध्या पर सबकी निगाहें हैं क्योंकि राममंदिरभूमिपूजन की बेला है। अवतारवाद की धारणा मानती है कि परमात्मा आत्मज के रूप में अवतरित हुए। किंतु इस धारणा के कारण वे परिस्थितियां और शिक्षण-विधियां गौण हो जाती हैं,जिन्होंने राम का निर्माण किया। राम की माता कौशल्या और रावण की माता कैकसी में बड़ा अंतर है।एक तरफ कौशल्या का प्रेम से भरा हृदय है तो दूसरी तरफ कैकसी का महत्वाकांक्षा से भरा मस्तिष्कअयोध्या का अर्थ होता है जहां कोई युद्ध(द्वंद्व) न हो। जहां प्रेम की इतनी प्रधानता थी कि सौतेली मां कैकई भी राम को कौशल्या से ज्यादा प्रेम करती थी। कुलगुरु वशिष्ठ की छाया में पला बचपन और गुरु विश्वामित्र से प्राप्त प्रशिक्षण की भूमिका पर भी गौर करना होगा जो राम जैसे व्यक्तित्व का निर्माण करती है। कुल (परिवार) का वातावरण और गुरुकुल का प्रशिक्षण हमारी निगाहों से ओझल हो जाए तो प्रेम और करुणा से पूर्ण व्यक्तित्व राम का निर्माण करना असंभव हो जाएगा। विज्ञान की आधुनिक खोजें कहती हैं कि आनुवंशिकी से ज्यादा वातावरण का व्यक्तित्व पर प्रभाव पड़ता है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी आनंद से युक्त सत्य और ज्ञान के खोजी व्यक्तित्व के निर्माण हेतु उत्सुक है। किसी भी राष्ट्र की प्रगति और समृद्धि को नापने का सबसे बड़ा इंडेक्स आज हैप्पीनेस इंडेक्स है। जिसके पास सीता जैसी सहधर्मिणी हो और लक्ष्मण जैसा भाई हो उसके लिए जंगल भी मंगल बन जाता है। कोरोना जनित वैश्विक विपदा के समय में जब चारों तरफ से निराशा ने सबको अपने आगोश में ले लिया है,ऐसे समय में राम का नाम जीवन में आशा और धैर्य का संचार करता है। मुझे तो व्यक्तिगत रूप से रामचरितमानस का वह दृष्टांत विशेष प्रिय है जिसे बाबूजी (श्री रामदेवजी) के मुख से बचपन में बार-बार सुनता था; जिसमें विभीषण श्री राम जी से पूछते हैं कि रावण रथ पर हैं और आप बिना रथ के;फिर यह युद्ध कैसे जीतेंगे?- "नाथ न रथ नहीं तन पद त्राणा , केहि बिधि जीतब वीर बलवाना" उस समय भगवान राम का जवाब था कि जिस जीवन रूपी रथ का निर्माण आंतरिक गुणों (सत्य,शील दृढ़ता,शौर्य,धैर्य, सम,यम,नियम इत्यादि) से हुआ हो उसके सामने रावण का रथ नहीं टिक सकता। दुर्भाग्य से हम महापुरुषों की मूर्तियां बनाकर संतुष्ट हो जाते हैं किंतु मंदिर निर्माण से ज्यादा यदि चरित्र निर्माण के अनुकूल परिवेश और शिक्षा-दीक्षा के निर्माण पर ध्यान नहीं दिया गया तो बिना रामसदृश गुणोंवाले जिंदा इंसान के दशरथनंदन-राम को दुनिया पौराणिक-पात्र ही मानती रहेगी। अतः राममंदिर तो भव्य बने ही किंतु राम जैसे दिव्य-चरित्र के मनुज भी बनें, इसके लिए कुल और गुरुकुल पर विशेष ध्यान दिए जाने की जरूरत है।'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे शुभकामनाओं और मंगलकामनाओं सहित 🙏🌹