सादर समीक्षार्थ "कृष्ण में इतना आकर्षण क्यूँ?" भारत एक अद्भुत देश है। देश शब्द से ज्यादा भारत एक संदेश है। वह संदेश यह है कि परस्पर विरोधी दिखाई देने वाली चीजें भी अविरोधी होती हैं। दिन और रात, सुख और दुख,सफलता और असफलता, महामारी और महाजीवन दो-नेत्रों से देखने पर अलग और विपरीत दिखाई पड़ते हैं किंतु तीसरे नेत्र से देखने पर उनकी आत्मा एक है। तभी तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम के देश में मर्यादा तोड़ने वाले कृष्ण भी जन-जन के हृदय में बसते हैं। स्वामी विवेकानंद के गुरु परमहंस जी के नाम में तो राम और कृष्ण दोनों एक साथ आ जाते हैं- रामकृष्ण परमहंस। कंस के कारागृह में जिसका जन्म होता है, वह परम स्वतंत्रता का सबसे बड़ा उद्घोषक बन जाता है। रण को छोड़कर भागने वाला रणछोड़ अर्जुन जैसे पलायन व विषादयुक्त मानसिकता वाले को महाभारत युद्ध के लिए मानसिक रूप से तैयार कर देता है। 'प्राण जाए पर वचन न जाई' की घोषणा करने वाले रघुकुल की धरती पर वह कृष्ण अपने सखा के कल्याण के लिए सभी के समक्ष की गई अपनी प्रतिज्ञा को दुनिया के सामने तोड़ देता है। एकपत्नीव्रत का पालन करने वाले राम के देश में कृष्ण गोपियों के साथ रास रचाते हैं,राधा के साथ हृदय मिलाते हैं और रुक्मिणी के साथ विवाह रचाते हैं। भारत के जन-गण-मन का मानस भी अद्भुत है कि वे रुक्मिणी-कृष्ण का नाम न लेकर राधा-कृष्ण भजते हैं। आज राजनीति वाद-विवाद और अपवाद के रूप में सिकुड़ गया है किंतु कृष्ण ने उसमें संवाद को बहुत ऊंचाई और विस्तार दिया। मुरलीधर में ही गिरिधर बनने की सामर्थ्य होती हैं। तभी तो इस देश ने कृष्ण को पूर्णावतार कहा। राजनीति के कांटो के बीच कृष्ण जैसे मुस्कुराते हुआ फूल का खिलना एक संदेश है कि नीति नहीं नीयत महत्वपूर्ण है - "मेरी रविश से खार भी बन जाएंगे हबीब , कांटो पर इस यकीन से खिलता गुलाब है ; सत्तापरस्त लोग वतन के हैं रहनुमा , सत्य क्या करे ये अपना ही तो इंतखाब है।" 'शिष्य-गुरू संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे कृष्ण-जन्माष्टमी की शुभकामनाओं सहित 🙏🌹