स्वातंत्र्यात् सुखमाप्नोति, स्वातंत्र्याल्लभते परम्
August 15, 2020स्वतंत्रता सावधानी के अभाव में पहले उच्छृंखलता लाती है फिर परतंत्रता । कोरोना से मुक्ति की लड़ाई उस लड़ाई से भिन्न है,जब देश स्वतंत्रता के लिए लड़ रहा था। कोरोना से स्वतंत्रता के लिए अपना इम्यून-सिस्टम मजबूत करना,घर में ज्यादा रहना, शारीरिक दूरी मेंटेन करना, मास्क पहनना और भीड़भाड़ से बचना जरूरी है जबकि देश की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों के विरोध में घर से बाहर निकल कर बड़ी से बड़ी रैलियों का आयोजन कर कंधे से कंधा मिलाकर अपने संगठन को मजबूत करना जरूरी था। स्व का तंत्र तभी अच्छा विकसित हो सकता है जब व्यक्ति स्वयं को जाने । इसके लिए सावधान और उत्तरदायित्वपूर्ण होना बहुत जरूरी है। स्वतंत्रता को हर कोई चाहता है किंतु सावधानी और उत्तरदायित्वपूर्णता को बहुत कम लोग। अतः बहुत कम लोग को ही सही मायने में स्वतंत्रता उपलब्ध हो पाती है। जो लोग स्वतंत्रता को उच्छृंखलता की तरह लेते हैं,वे फिर से परतंत्र बन जाते हैं। कोरोना का बढ़ता संक्रमण,अर्थव्यवस्था की माली हालत, बढ़ती बेरोजगारी के कारण निराशा और हिंसा की बढ़ती प्रवृत्ति से आज देश चारों तरफ से संकटों से घिर गया है। ऐसे में स्वतंत्रता दिवस उन बलिदानियों के त्याग-तपस्या से युक्त सजग और कर्मठ जीवन की याद दिलाता है जिन्होंने स्वयं का ऐसा तंत्र विकसित किया कि भारत गुलामी की जंजीरें तोड़ने में सफल हो सका। स्वतंत्रता के उत्तरदायित्वपूर्ण और सावधान पुजारियों की संतानों को जब हम बिना मास्क पहने भीड़भाड़ वाले इलाके में शारीरिक दूरी की परवाह न करते हुए अनुचित तथा गैर कानूनी कार्यों में लिप्त देखते हैं तो मन में एक वाजिब सवाल उठता है कि क्या हम भारत के लोग स्वतंत्रता का सही अर्थ समझ पाए हैं? छेड़खानी की घटना में प्रतिभाशाली बालिका की मौत,नफरत भरे पोस्ट से जलता बेंगलुरु, कोरोना संक्रमण को छुपाकर बेफिक्र समाज में घूमते लोग और भ्रष्टाचार-अपराध-हत्या- आत्महत्या की बढ़ती घटनाएं स्पष्ट शब्दों में और बड़े ऊंचे स्वर में कह रही है कि स्वतंत्रता को सही मायने में बाहरी और आंतरिक जीवन में उतार कर ही हम महामारीजनित इस महासंकट से उबर सकते हैं। अष्टावक्र महागीता कहती हैं- "स्वातंत्र्यात् सुखमाप्नोति, स्वातंत्र्याल्लभते परम्". - 'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ. सर्वजीत दुबे स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाओं के साथ🙏🌹