"धोनी का संन्यास" -इस खबर ने स्वतंत्रता दिवस की मुख्य खबर का रुख मोड़ दिया।पल दो पल में ध्रुव तारा बनने के गुण उनमें विद्यमान थे। कोई उन्हें हेलीकॉप्टर शॉट के कारण याद कर रहा था तो कोई मिस्टर कूल के रूप में। ट्वेंटी-ट्वेंटी वर्ल्डकप और वनडे वर्ल्डकप के विजेता कप्तान के रूप में उनका योगदान तो सबकी नजरों में हैं। लेकिन मेरी नजरों में यह बात विशेष रूप से आ रही है कि पहले इंडिया की टीम मुंबई और दिल्ली के खिलाड़ियों से ही पूरी हो जाती थी। उस समय बिहार जैसे पिछड़े क्षेत्र से इंडिया टीम में स्थान बनाने का कोई सोच भी नहीं पाता था। किंतु धोनी ने न सिर्फ सोचा बल्कि इंडिया टीम में स्थान बनाकर अपने गैर परंपरागत खेल की शैली से स्थायी जगह भी बना ली और नेतृत्व भी अपने कब्जे में कर लिया। क्रिकेट की कॉपी बुक स्टाइल से अलग तरीके से उनकी बैटिंग की कला से मिली सफलता यह बताती हैं कि आत्मविश्वास इतनी बड़ी चीज है कि उसके आधार पर कई मान्यताएं तोड़ी जा सकती हैं। धोनी फिल्म में जितने भी क्रिकेट से संबंधित पात्र और ग्राउंड थे, उनसे मेरा भी थोड़ा-बहुत परिचय रहा। 1983 में वर्ल्ड कप जीतकर कपिल देव ने क्रिकेट को जन-जन में लोकप्रिय बना दिया और उसके साथ क्रिकेट के प्रति दीवानगी का दौर शुरू हुआ। दीवानगी ऐसी की कई खिलाड़ी साथ में क्रिकेट का सामान लेकर सोते थे और इसके अतिरिक्त बात का कोई मुद्दा ही नहीं होता था। कपिल दा की अपनी निजी शैली थी और उन्होंने दिल्ली और मुंबई के वर्चस्व में सेंध लगाई। उस समय बिहार की क्रिकेट टीम भी पटना और रांची के खिलाड़ियों से ही पूरी हो जाती थी। पटना के खिलाड़ियों के बीच में से एक अत्यंत प्रतिभाशाली क्रिकेटर सबा करीम जिन्होंने इंडिया खेला और BCCIमें बड़े पदाधिकारी भी बने के पास अद्भुत प्रतिभा और तकनीक थी,किंतु उस हिसाब से वे लाईमलाईट में नहीं आ पाए। दूसरी तरफ धोनी के खेल का अंदाज कुछ और था किंतु अपनी नैसर्गिक प्रतिभा और स्टाइल से वे एक गेम चेंजर बन गए। सोच कर कभी-कभी हैरानी होती है कि यह व्यक्तित्व इतना आक्रामक बल्लेबाज और इतना कूल कप्तान दो विरोधी गुणों को कैसे समावेशित कर सका। लेकिन अपने अनुशासित जीवन और शांत स्वभाव के कारण ही वे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में इतने लंबे समय तक तीनों फॉर्मेट में अपना स्थान बनाए रखे।। प्रसिद्धि,पैसा कमाने के मामले में शिखर को छूने वाले धोनी के संन्यास की खबर के साथ मेरे जेहन में अपने साथ दिन-रात क्रिकेट के सपने देखने वाले उन प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की भी तस्वीरें आ रही थीं,जिनकी प्रतिभा और परिश्रम धोनी के समान ही था किंतु वे जीवन की भूलभुलैया में खो गए और उन्हें एक छोटी सी नौकरी तक नसीब नहीं हुई। जब मैंने क्रिकेट में बैन लगने पर पढ़ाई का रास्ता मजबूरी में चुना था ,उस समय मुझे पता नहीं था कि बहुत कम मेहनत से पढ़ाई में इतनी बड़ी सफलता मिल जाती है। क्योंकि शिक्षा के ढांचे में कुछ तो व्यवस्था और विकल्प है किंतु खेल के ढांचे में कोई व्यवस्था और विकल्प नहीं। क्रिकेट ही नहीं बल्कि अन्य खेलों में भी में कई खिलाड़ी दूरदराज के पिछड़े क्षेत्रों में अद्भुत प्रतिभा और परिश्रम के बावजूद समुचित सुविधाएं नहीं मिलने,समय पर ब्रेक नहीं मिलने और राजनीतिक हस्तक्षेप के कारणों से खिलने के पहले ही डालों से टूटे मिलते हैं- "समय से पहले डालों से टूटा मिलता है , अपने सपनों के मुताबिक कोई फूल कहां खिलता है?" "मैं पल दो पल का शायर हूं" के अल्फाज से अपने संन्यास की घोषणा करने वाले धोनी चिरकाल तक याद आते रहेंगे और विशेष रुप से दूरदराज के पिछड़े क्षेत्रों में उन खिलाड़ियों को प्रेरित करते रहेंगे जो जमीन पर रहकर भी आसमान के सितारे बनने का सपना देखते हैं।'शिष्य- गुरु संवाद'से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹