विवेकशून्यता
August 21, 2020"विवेकशून्यता" - डॉ विवेक द्वारा डॉ योगिता की हत्या शिक्षा और जीवन-शैली पर कई प्रश्न खड़े करती हैं। दूसरे को स्वस्थ करने के लिए जिनको तैयार किया गया,वे स्वयं ही अस्वस्थ निकले। लंबे समय तक एक दूसरे के साथ रहने के बाद लड़की शादी को तैयार नहीं होती और लड़का छोड़ने को तैयार नहीं होता। शिक्षित के साथ आज सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि अकेले रह नहीं पाते और दूसरे को सह नहीं पाते। उपयोगितावादी दृष्टि वाली यह जीवन-शैली वस्तु की तरह व्यक्ति को भी साधन समझने लगती है। डर फिल्म में "तू हां कर या ना कर ,तू है मेरी किरण.." की जो भावना व्यक्त की गई है, उसमें लड़की के प्रति वस्तुवादी दृष्टिकोण है। वस्तु के दान की तरह कन्यादान वाली पारंपरिक सोच वाले लोग लिव इन रिलेशनशिप की आधुनिकतम सोच के साथ कैसे तालमेल बिठा पाएंगे? शिक्षा ने लड़कियों को अपने वजूद का एहसास तो करा दिया किंतु लड़कों को लड़की के वजूद के प्रति संवेदनशील नहीं बना पायी। अतः नारी घर और ऑफिस के दोहरे दायित्व से त्रस्त होने लगी है- "उत्सवों में गूंजकर रोती है फिर लपटों के साथ , बेटियां जलती रही शहनाइयां बढ़ती गईं। डालियों पर पंछियों का बैठना है अब मना , आशियां गिरते गए अमराईयां बढ़ती गईं।।" आजीविका प्राप्त करने की शिक्षा महत्वाकांक्षापूर्ण है किंतु गृहस्थाश्रम प्रेम और समर्पण की मांग करता है। अतः पढ़े-लिखे लड़के लड़कियों की शादी करा पाना बहुत मुश्किल हो रहा है और उनमें सामंजस्य बिठा पाना तो लगभग नामुमकिन। पारिवारिक और सामाजिक ताने-बाने में तीव्र गति से बहुत बड़े बदलाव की जरूरत है,जो हो नहीं पा रहा है। सिर्फ मस्तिष्क का विकास करने वाली परवरिश और शिक्षा में हृदय की भावनाओं को जानने और समझने का अवकाश ही कहां होता है? विवेक को जाग्रत करने वाली शिक्षा ही दो विरोधी ध्रुवों के बीच सामंजस्य बिठाने की कला सिखा सकती हैं। किंतु ऐसी शिक्षा के लिए विवेकशील- व्यक्तित्व घर और विद्यालय दोनों में साक्षात रुप से युवा पीढ़ी के साथ जुड़े होने चाहिए। अन्यथा मशीन बनाने वाली शिक्षा से विभिन्न मनों के बीच में सामंजस्य बिठाने की दीक्षा प्राप्त नहीं हो सकती। 'शिष्य-गुरु संवाद'से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹