ध्यान जगे तो नशा छूटे -नशा का व्यापार संगठित और संस्थागत रूप ले चुका है।अश्लीलता और घृणा- हिंसा का व्यापार तभी फल-फूल सकता है जब व्यक्ति बेहोश हो। एक सुंदर नौजवान निजी अस्पताल के कंपाउंडर से उसके चरण छू कर कई घंटे से विनती कर रहा था कि वह उसे इंजेक्शन दे दे। मैंने आश्चर्यचकित होकर कंपाउंडर से पूछा कि आप इसकी बात मान क्यों नहीं लेते? मुझे भी तो आपने इंजेक्शन दे दिया; फिर इसे क्यों नहीं दे रहे? कंपाउंडर का जवाब था- आपका इंजेक्शन जरूरत का है और इसका इंजेक्शन नशे का है। अंत में हॉस्पिटल के मालिक डॉक्टर को आना पड़ा और उसे मजबूरन इंजेक्शन लगाना पड़ा तब जाकर वह थोड़ा शांत हुआ। बाद में पता चला कि वह लड़का बड़े घराने का है और स्कूल का टॉपर होने के बावजूद उसने ऐसी राह पकड़ ली है कि अपना तन-मन सबको बर्बाद कर लिया और जब तक नशे का इंजेक्शन नहीं लगवा लेता तब तक वह सामान्य रह ही नहीं पाता। दुख से पार जाने के लिए जिस रासायनिक और क्षणभंगुर उपाय को अपनाया जाता है,उसका आकर्षण इतना गहरा है कि जब तक मादक द्रव्य मिल नहीं जाए तब तक यह दुनिया बेकार लगती है और मिल जाए तो नशा टूटने के बाद होश आते ही सब कुछ लुट गया सा लगता है। फिर आदत पीछा करने लगती हैं और शरीर का रोम-रोम उस रसायन की मांग करने लगता है। उस पर से नशे के लिए यदि साहित्यिक और धार्मिक आधार ढूंढ लिया जाए तो कहना ही क्या!' दम मारो दम,मिट जाए गम ; बोलो सुबह शाम,हरे कृष्णा हरे राम' गाने ने तो नशे के कारोबार को आसमान पर पहुंचा दिया। "दुनिया ने हमको दिया क्या, दुनिया से हमने लिया क्या ?हम सबकी परवाह करे क्यूँ , सबने हमारा किया क्या??" - इस बोल ने नशेड़ियों को परिवार और समाज विरोधी एक गलत वैचारिक आधार दे दिया। जब ऋषि सोमरस पीते हैं और भगवान शंकर गांजा-भांग का सेवन करते हैं तो नशे के जाल में फंसे लोग पूछते हैं कि ऐसा हमने क्या अपराध कर दिया? गलत तथ्य पेश कर गलत कार्य को सही नहीं ठहराया जा सकता। सत्य यह है कि दोनों पदार्थों का सेवन होश को और बढ़ाने के लिए किया जाता था। प्रत्येक व्यक्ति में प्रकृति-प्रदत काम,क्रोध,लोभ,मोह, मद,मात्सर्य आदि भाव ही बेचैन करने के लिए पर्याप्त हैं। इसके ऊपर से शराब, गांजा,कोकिन,चरस,हेरोइन इत्यादि तो बेचैनी को उन्माद में बदल देने के लिए बहुत ज्यादा है। मानो बंदर ने कई घड़े शराब पी ली हो और उस पर से उसे बिच्छू डंक मार दे; ऐसी विक्षिप्त परिस्थिति और मन:स्थिति से निकलने का उपाय क्या है? नशा छुड़ाने के कई प्रयास हो रहे हैं किंतु ओशो ने नशे के आदी लोगों को कोई भी नशा छोड़ने को कभी नहीं कहा। बस प्रार्थना,ध्यान इत्यादि के प्रयोगों में उन्हें उतारा। जिस मात्रा में उनका होश बढ़ता गया उसी मात्रा में मादक द्रव्य की जरूरत कम होती चली गई। वे मानते थे- "नशे में कौन नहीं है ये तो बताओ जरा , किसे है होश उसे सामने तो लाओ जरा।" सबकी नजरों में स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि मादक द्रव्यों के नशे में तो अपराध होते ही हैं किंतु उससे भी बड़े अपराध तो धन-पद आदि के सूक्ष्म नशे में किए जाते हैं। कोई भी नशा बुरा है किंतु यदि नशे के बिना नहीं रहा जा सकता तो जरूरत है उसे उच्चतर कोटि के भजन-ध्यान इत्यादि नशे में नियोजित किया जाए। सभी धर्मों ने होश पर सबसे ज्यादा जोर दिया है। उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि बेहोशी में तन और मन तो खराब होता ही है। सबसे बुरा असर आत्मा पर पड़ता है। जिस आत्मा में परमात्मा को छू लेने की सामर्थ्य है, वह आत्मा मरती चली जाती है और नशे में न जाने कैसे-कैसे कृत्य कर बैठती है। 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹