"कानून और अंतरात्मा" -गांधी जी की प्रतिमा के 100 मीटर के दायरे में खोली गई शराब दुकान बंद करने के लिए लगाई गई जनहित याचिका कर्नाटक हाईकोर्ट ने खारिज कर दी। आबकारी लाइसेंस नीति के अनुसार शराब की दुकान पूजा स्थल या इसके समान अन्य स्थलों पर नहीं खोली जा सकती है। जनहित याचिका लगाने वाले का तर्क था कि गांधी जी की मूर्ति के पास कई लोग प्रार्थना करते हैं,ऐसे में उसे पूजा स्थल या धार्मिक स्थल माना जाना चाहिए। किंतु कोर्ट ने माना कि गांधी की प्रतिमा पूजा स्थान या धार्मिक जगह नहीं है। यह खबर पढ़कर एक विद्यार्थी ने जो प्रश्न उठाए हैं,उसका जवाब मुझे सूझ नहीं रहा।अतः आपके समक्ष रख दे रहा हूं -(1)क्या माननीय उच्च न्यायालय को सिर्फ कानूनी दृष्टिकोण से ही विचार करना चाहिए? (2)क्या नैतिक और सामाजिक पक्ष को दरकिनार कर कोई कानून मजबूत हो सकता है? (3)मद्यनिषेध के लिए तो गांधी जी ने बहुत जनजागरूकता अभियान चलाया और उनका कहना था कि शराब(नशा) शरीर और आत्मा दोनों को खराब कर देती हैं ; ऐसे में उनकी प्रतिमा के 100 मीटर के दायरे में शराब की दुकान का खोला जाना क्या संदेश देता है?(4)क्या अंतरात्मा ऐसी बातों को कुबूल करती हैं? - राष्ट्रपिता ने कानून की पढ़ाई की थी और अपनी अंतरात्मा की आवाज पर कानून से लड़ाई भी की थी किंतु आज हिंदुस्तान की अंतरात्मा की आवाज अजीबोगरीब और परस्पर-विरोधी हो गई है क्योंकि उसके मूल में सत्य,प्रेम,अहिंसा नहीं है- "अगर मस्जिद से वायज आ रहे हैं?तो लोगों के कदम क्यों डगमगाए जा रहे हैं?? "'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹