"भाषा-दिवस की प्रासंगिकता" -हिंदी भाषा को नई शिक्षा नीति के तहत गैर हिंदी भाषी राज्यों में भी अनिवार्यत: लागू करने का इरादा था। उद्देश्य था एक राष्ट्र एक भाषा के सिद्धांत को आगे बढ़ाना किंतु दुर्भाग्य से हिंदी भाषा थोपने का मुद्दा उठाया गया।खासकर दक्षिण भारतीय राज्यों के भारी विरोध को देखते हुए प्रस्ताव में संशोधन कर दिया गया। हिंदी,हिंदू,हिंदुस्तानी के ध्येय-वाक्य पर चलने वाली बहुमत की सरकार भी अंग्रेजी के वर्चस्व के सामने हिंदी को आगे बढ़ाने की अपनी रणनीति से पीछे हट गई। ऐसी परिस्थितियों और मन:स्थितियों में हिंदी से प्रेम करने वालों को हिंदी के लिए राष्ट्रभाषा विशेषण का इस्तेमाल करने से परहेज करना चाहिए। संविधान या कोई भी कानून देश में किसी भी एक राष्ट्रभाषा का जिक्र नहीं करता। बेहतर तो यह होता कि हिंदी के स्वाभिमान को बढ़ाने के लिए राजभाषा का कागजी आभूषण भी छोड़ दिया जाता। देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी भारत की राजभाषा होगी (अनुच्छेद 343-1) के कारण ही दक्षिण भारत में हिंदी विरोधी आंदोलन शुरू हुआ जिसका मुख्य नारा था- English ever,HINDI never. इसके कारण व्यवहार में अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ता गया और हिंदी को एक सांकेतिक सम्मान का स्थान मात्र दे दिया गया। विश्व में कोई भी ऐसा देश नहीं है जो अपनी भाषा विशेष का दिवस मनाता हो और वह भी महज खानापूर्ति के लिए। स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में हिंदी ने सबको जोड़ने का काम किया,अतः गांधी और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जैसे महापुरुषों ने इस भाषा को भारत की आवाज के रूप में सम्मान दिया। अपनी लोकप्रियता के दम पर हिंदी बेताज बादशाह बन गई। किंतु ज्यों ही ताज पहनाने की बात आई त्यों ही हिंदी का विरोध शुरू हो गया। गांधीजी जिस प्रकार बिना किसी पद को ग्रहण किए हुए अपने सामर्थ्य और समर्पण के कारण भारत के राष्ट्रपिता बन गए,उसी प्रकार से हिंदी में वह सामर्थ्य है कि वह भारत की राष्ट्रभाषा कहलाए। बस हिंदी प्रेमियों को हिंदी दिवस की जगह भारतीय भाषाओं का भाषा दिवस मनाने की पहल करने की जरूरत है। भाषा तो समर्थ होती है उस भाषा के बोलने वाले लोगों के सामर्थ्य और प्रेम के कारण। संख्यात्मक दृष्टिकोण से व्यापक हिंदी प्रेमियों को गुणात्मक दृष्टिकोण से स्वयं में लचीलापन लाकर अन्य भारतीय भाषाओं को भी सीखने पर जोर देना होगा। जैसे अनेक नदियां गंगा में मिलकर सागर की ओर उन्मुख हो जाती हैं, उसी प्रकार अनेक बोलियां हिंदी में मिलकर भाषा सागर की ओर उन्मुख होकर जीवन को और समृद्धि प्रदान करे।. 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे हिंदी प्रेमियों को अपनी सामर्थ्य और हिंदी के प्रति लगाव बढ़ाते रहने की शुभकामनाओं के साथ....🙏🌹