आशावाद बनाम निराशावाद- कोरोना पीड़ितों की संख्या बढ़ रही हैं और अर्थव्यवस्था गिर रही है। नौकरियां कम से कम होती जा रही हैं और लोगों की जमा राशि खत्म होती जा रही है। पड़ोसी देशों के साथ संबंध बिगड़ते जा रहे हैं और देशवासियों का आपसी सौहार्द गिरता जा रहा है। एक भी संदेश आशा का नहीं देते सितारे ,प्रकृति ने मंगल शकुन पथ में नहीं मेरे संवारे- ऐसी परिस्थितियों में भी आशावादी रोज नए-नए सपने गढ़ लेता है। चीजों के तथ्यात्मक अंधेरे पक्ष को इनकार करके उजले पक्ष को अपनी कल्पना शक्ति से सृजित कर लेता है। इससे कुछ देर के लिए तनाव तो दूर हो जाता है किंतु आशा की कोई भी किरण दिखाई नहीं देने से निराशा और भी गहरी होती जाती है। निराशावादी चीजों के सिर्फ अंधेरे पक्ष को उद्घाटित किए चला जाता है और उजले पहलू को पूर्णतया इंकार कर देता है। पक्ष और विपक्ष को सुनने के बाद कन्फ्यूजन और भी बढ़ जाता है। पक्ष और विपक्ष एक दूसरे से भिन्न नहीं है यद्यपि भिन्न दिखाई पड़ते हैं। वे दोनों एक ही घटना के दो विपरीत ध्रुव हैं। इनमें से कोई भी पूर्ण सत्य को स्वीकार नहीं करता। दोनों ही तथ्य और सत्य को इंकार कर रहे हैं। 100 में 99 लोग निराशावादी होते हैं। इनके कारण वह आशावादी मूल्यवान बन जाता है जो दिन में भी सपने दिखाए चले जाता है। आज देश को इन दो अतियों से निकालने की जरूरत है- Excess of everything is bad . माना कि कांटे बहुत बढ़ गए हैं किंतु उसके ऊपर एक गुलाब खिलने वाला है। पौधे में पहले आने वाले कांटे को ही जो सब कुछ मान लेगा वह अवसाद और आत्महत्या का शिकार हो जाएगा।। दूरदृष्टि उत्पन्न करनी पड़ेगी तभी गुलाब का खिलना देख सकेंगे। महात्मा बुद्ध के सब्बं दुखम् कहने के कारण पश्चिम के विचारकों ने भारतीय दर्शन को निराशावादी घोषित कर दिया। किंतु बुद्ध के परम आनंद को देखकर कौन उन्हें निराशावादी स्वीकार करेगा? दुख प्रारंभ है,आनंद मंजिलआशावाद और निराशावाद दोनों के पार देखने वाली दृष्टि की आज जरूरत है। किंतु इन्हीं दोनों में से एक को ही चुनना पड़े तो परिपक्व-दृष्टि वाले लोग थोड़े समय के लिए निराशावाद को चुनना पसंद करेंगे। क्योंकि निराशा के कांटे प्रतिपल चुभते रहेंगे तो हमें नींद नहीं आएगी- "यह कौन चमनपरस्त गुजरा है इन राहों से , मैंने कांटों पर भी होठों के निशान देखे हैं।" जबकि आशावाद झूठी नींद में सुला देता है। 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹